त्योहारी सीजन में बाजारों में सियासी हंगामे से सहमे कारोबारी
देश के दो सबसे बड़े व्यावसायिक महानगरों दिल्ली और मुंबई में इन दिनों त्योहारी सीजन की चमक फीकी पड़ती नजर आ रही है। बाजारों में ग्राहकों की भीड़ उमड़ने के बजाय राजनीतिक दलों और संगठनों के विरोध प्रदर्शनों का शोर गूंज रहा है। दिल्ली के दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस और मुंबई के प्रमुख बाजारों में पिछले कुछ हफ्तों से लगातार चल रहे प्रदर्शनों ने दुकानदारों की नींद उड़ा दी है। स्थिति यह हो गई है कि सालभर जिस त्योहारी सीजन का व्यापारी बेसब्री से इंतजार करते हैं, उसी दौरान उन्हें अपनी दुकानें बंद रखने या भारी मंदी का सामना करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
व्यापारियों का कहना है कि विरोध प्रदर्शन करना हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन इसके नाम पर शहर के मुख्य व्यावसायिक इलाकों को निशाना बनाना और आम जनता की आवाजाही को बाधित करना पूरी तरह अनुचित है। फेस्टिव सीजन के दौरान जब बाजारों में पैर रखने की जगह नहीं होनी चाहिए, वहां प्रदर्शनों के डर से खरीदार आने से कतरा रहे हैं। इसका सीधा असर छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े शोरूम मालिकों और रेस्तरां संचालकों की रोजमर्रा की कमाई पर पड़ रहा है।
कनॉट प्लेस के व्यापारियों ने खोला मोर्चा, पुलिस के समर्थन में उतरी भीड़
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के कनॉट प्लेस में हाल ही में एक अलग ही नजारा देखने को मिला, जब स्थानीय व्यापारियों और दुकानदारों ने खुलकर पुलिस प्रशासन के समर्थन में आवाज उठाई। पिछले कई दिनों से जारी विरोध प्रदर्शनों और बाजार बंद होने की अफवाहों से त्रस्त दुकानदारों ने सड़कों पर उतरकर 'दिल्ली पुलिस आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं' के नारे लगाए। व्यापारियों का आरोप है कि जानबूझकर सेंट्रल दिल्ली के बिजनेस हब को प्रदर्शन के लिए चुना जाता है, जिससे उनके कारोबार पर सबसे बुरा असर पड़ता है।
व्यापारिक संगठनों के अनुसार, जब भी किसी बड़े मार्च या प्रदर्शन की घोषणा होती है, तो ग्राहकों के मन में सुरक्षा को लेकर डर बैठ जाता है। लोग परिवार के साथ खरीदारी के लिए आने से बचते हैं। नई दिल्ली ट्रेडर्स एसोसिएशन के पदाधिकारियों का दावा है कि इन प्रदर्शनों के कारण पूरे इलाके में रोजाना करोड़ों रुपये का कारोबार प्रभावित हो रहा है। खान मार्केट और दूसरे प्रमुख बाजारों के दुकानदार भी इसी तरह की गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं और सरकार से उचित मुआवजे या सुरक्षा की गुहार लगा रहे हैं।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से हस्तक्षेप की मांग
बढ़ते आर्थिक नुकसान और कारोबारियों के उग्र होते असंतोष को देखते हुए दिल्ली के प्रमुख व्यापारी संगठन 'सीटीआई' (चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री) ने सीधे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से दखल देने की अपील की है। सीटीआई ने मांग की है कि कम से कम दिवाली और धनतेरस जैसे बड़े त्योहारों के मद्देनजर बाजारों में किसी भी तरह के बड़े विरोध प्रदर्शनों या रैलियों पर पूरी तरह रोक लगाई जाए, ताकि व्यापारी शांतिपूर्ण तरीके से अपना काम-धंधा कर सकें।
संगठन का तर्क है कि कोविड महामारी के बाद से ही खुदरा बाजार पहले से ही ऑनलाइन शॉपिंग जैसी बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में त्योहारों के दिनों में होने वाला यह हंगामा व्यापारियों की कमर तोड़ रहा है। व्यापारियों ने अदालत का दरवाजा भी खटखटाया है और हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के पुराने दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए प्रदर्शनों के लिए शहर से बाहर किसी निश्चित स्थान को तय करने की मांग की है ताकि आम जनजीवन और व्यापार सुरक्षित रह सके।
"विरोध प्रदर्शन करना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, लेकिन इसके नाम पर शहर की सामान्य गतिविधियों और हमारी रोजी-रोटी को संकट में डालना कहां का न्याय है? त्योहारों के समय बाजार चलने से ही देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है।" — वीरेन शाह, वरिष्ठ व्यापारी नेता
मुंबई के बाजारों में भी गूंजा व्यापारियों का दर्द
सिर्फ दिल्ली ही नहीं, बल्कि आर्थिक राजधानी मुंबई के पारंपरिक बाजारों का हाल भी कुछ ऐसा ही है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और अन्य संगठनों द्वारा किए जा रहे प्रदर्शनों के कारण मुंबई के प्रमुख व्यापारिक केंद्रों पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। व्यापारियों का कहना है कि त्योहारों की खरीदारी के समय बाजारों में सुरक्षा व्यवस्था और भीड़भाड़ के बीच इस तरह के राजनीतिक विरोध प्रदर्शन ग्राहकों को डरा रहे हैं। लोग दुकानों पर आने के बजाय ऑनलाइन माध्यमों का रुख कर रहे हैं, जिससे स्थानीय दुकानदारों का मुनाफा लगातार घटता जा रहा है।
व्यापारियों ने साफ शब्दों में कहा है कि यदि समय रहते इस स्थिति को नियंत्रित नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में छोटे व्यापारियों के सामने दिवालिया होने जैसी नौबत आ सकती है। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों और विपक्षी दलों का तर्क है कि लोकतांत्रिक देश में अपनी बात रखने के लिए आवाज उठाना उनका संवैधानिक हक है। बहरहाल, इस सियासी रस्साकसी और विरोध के बीच पिसता हुआ आम दुकानदार और खरीदार सिर्फ यही उम्मीद कर रहा है कि प्रशासन जल्द ही कोई ऐसा ठोस समाधान निकाले जिससे त्योहारों का यह सीजन बिना किसी बाधा के शांतिपूर्ण ढंग से गुजर सके।








