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व्यापार घाटे की मार: जापान, साउथ कोरिया और आसियान के साथ एफटीए में कहां चूका भारत?

भारत के मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) पर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। जापान, दक्षिण कोरिया और आसियान देशों के साथ हुए समझौतों के बाद व्यापार घाटा कई गुना बढ़ गया है, जिसे अर्थशास्त्री 'एकतरफा ट्रैफिक' करार दे रहे हैं।
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बिजनेस एवं मार्केट डेस्क, द फ्रीलांस
अर्थव्यवस्था व बाजार ब्यूरो•3 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•24
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व्यापार घाटे की मार: जापान, साउथ कोरिया और आसियान के साथ एफटीए में कहां चूका भारत?
📷 व्यापार घाटे की मार: जापान, साउथ कोरिया और आसियान के साथ एफटीए में कहां चूका भारत? — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • भारत के मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) पर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। जापान, दक्षिण कोरिया और आसियान देशों के साथ हुए समझौतों के बाद व्यापार घाटा कई गुना बढ़ गया है, जिसे अर्थशास्त्री 'एकतरफा ट्रैफिक' करार दे रहे हैं।
  • इस खबर से जुड़े सभी पहलुओं की जांच और निगरानी संबंधित विभागों द्वारा की जा रही है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार इस घटनाक्रम का आम जनता पर सीधा असर पड़ सकता है।

नई दिल्ली: 'द फ्रीलान्स' के लिए ऑन-द-ग्राउंड विशेष रिपोर्ट। भारतीय बाजारों में पिछले कुछ महीनों से व्यापारिक असंतुलन को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है। खासकर तब जब एशियाई दिग्गजों—जापान, दक्षिण कोरिया और आसियान (ASEAN) देशों—के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) के आंकड़े सामने आए हैं। वरिष्ठ अर्थशास्त्रियों और ग्राउंड पर मौजूद कारोबारियों का एक सुर में कहना है कि ये समझौते भारत के लिए 'एकतरफा ट्रैफिक' साबित हो रहे हैं, जहां निर्यात के मुकाबले आयात बेतहाशा बढ़ा है।

एकतरफा ट्रैफिक: आखिर क्या है एफटीए का सच?

जब भारत ने दक्षिण कोरिया, जापान और आसियान ब्लॉक के साथ एफटीए पर हस्ताक्षर किए थे, तो यह उम्मीद जताई गई थी कि भारतीय उत्पादों को वैश्विक बाजारों में एक बड़ी छलांग मिलेगी। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट नजर आ रही है। स्थानीय उद्योगों और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का कहना है कि इन समझौतों ने घरेलू बाजार को सस्ते विदेशी सामानों के लिए खोल दिया, जबकि भारतीय उत्पादों के लिए विदेशी बाजारों में आज भी गैर-शुल्क बाधाएं (Non-Tariff Barriers) दीवार बनकर खड़ी हैं। नतीजतन, व्यापार घाटा कई गुना बढ़ गया है और देश का घरेलू उत्पादक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है।

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वैश्विक आर्थिक हलचल और घरेलू बाजार की तपिश

इस बीच वैश्विक स्तर पर भी आर्थिक उथल-पुथल मची हुई है। अमेरिका से लेकर यूरोपीय बाजारों तक कर्ज और महंगाई के नए समीकरण बन रहे हैं। अमेरिकी ऋण और महंगाई से निपटने के लिए उठाए जा रहे कदमों की गूंज पूरी दुनिया के बाजारों में सुनाई दे रही है। इसका असर भारत के रिटेल सेक्टर और एमएसएमई (MSME) पर भी पड़ रहा है। हाल ही में डिजिटल पेमेंट और 'नो यूपीआई डे' जैसे मुद्दों पर व्यापारियों का सड़कों पर उतरना यह साफ दर्शाता है कि घरेलू बाजार पहले से ही कई तरह के दबावों से जूझ रहा है। ऐसे में आयातित सामानों की बाढ़ ने छोटे कारोबारियों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।

नीतिगत समीक्षा की सख्त जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब अपनी व्यापार नीति (Trade Policy) पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है। जापान और दक्षिण कोरिया जैसी तकनीकी महाशक्तियों के साथ व्यापारिक समझौतों में 'शर्तों के संतुलन' पर विशेष ध्यान देने की जरूरत थी। आसियान देशों के साथ भी थर्ड-पार्टी रूट (जैसे चीन के सामानों का वाया आसियान भारत पहुंचना) एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है। नीति निर्माताओं के लिए यह आत्ममंथन का दौर है कि आखिर रणनीतिक समझौतों के बावजूद देश का व्यापार घाटा लगातार क्यों गहराता जा रहा है।

निष्कर्ष और आगे की राह

'द फ्रीलान्स' की इस पड़ताल का निष्कर्ष यह है कि जब तक घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत नहीं किया जाता और एफटीए के तहत भारतीय निर्यातकों को मिलने वाली बाधाओं को दूर नहीं किया जाता, तब तक यह 'एकतरफा ट्रैफिक' यूं ही भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाता रहेगा। आने वाले दिनों में सरकार पर इन समझौतों की समीक्षा करने का दबाव और अधिक बढ़ने की पूरी उम्मीद है।

द फ्रीलांस पत्रकारिता नीति (Editorial Commitment):हम निष्पक्ष, सटीक और तथ्यात्मक पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह समाचार रिपोर्ट विभिन्न प्रमाणित समाचार एजेंसियों, आधिकारिक बयानों और स्थानीय संवाददाताओं से प्राप्त इनपुट के आधार पर तैयार की गई है।
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बिजनेस एवं मार्केट डेस्क, द फ्रीलांस

सत्यापित संपादकीय डेस्क

अर्थव्यवस्था, शेयर बाजार, बजट व पर्सनल फाइनेंस टीम

द फ्रीलांस की बिजनेस डेस्क भारतीय अर्थव्यवस्था, शेयर बाजार, बजट, महंगाई, बैंकिंग, स्टार्टअप्स और आम नागरिक के घरेलू बजट पर पड़ने वाले नीतिगत प्रभावों का गहन डेटा-आधारित विश्लेषण करती है।

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