नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश से मानसून की आधिकारिक विदाई हो चुकी है, लेकिन आसमान में काले बादलों का डेरा अभी भी खत्म नहीं हुआ है। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण के कई राज्यों तक अचानक हो रही भारी बारिश ने आम आदमी और किसानों दोनों को हैरानी में डाल दिया है। लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि सितंबर और अक्टूबर बीत जाने के बाद भी यह पानी क्यों बरस रहा है। हमारी टीम ने जब मौसम विभाग के आंकड़ों और जमीन पर मौजूद किसानों से बात की, तो सामने आया कि इस बार मौसम का चक्र पूरी तरह से अपनी तय पटरी से उतर चुका है।
इस अजीब स्थिति के पीछे सबसे बड़ा हाथ महासागरों में चल रही उठापटक का है। वैज्ञानिक इसे सुपर अल नीनो का असर बता रहे हैं। प्रशांत महासागर में पानी का तापमान सामान्य से बहुत ज्यादा गर्म हो गया है। इसका सीधा असर भारत के मौसम पर पड़ रहा है और हवाओं का दबाव पूरी तरह बदल गया है। यही वजह है कि मानसून जाने के बाद भी अचानक नमी वाली हवाएं आ रही हैं और आसमान में बादल घिरकर जोरदार बरसात कर रहे हैं।
खेती पर पड़ा सीधा असर और चीनी की बढ़ती कीमतें
मौसम के इस बेरुखे रवैये से देश का कृषि बाजार बुरी तरह हिल गया है। फसल कटाई के समय हो रही इस बेमौसम बरसात ने खेतों में खड़ी धान और सोयाबीन की पकी फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है। खेतों में पानी भर जाने से दाने काले पड़ गए हैं और किसानों की महीनों की मेहनत पानी में मिल गई है। इसके साथ ही गन्ने की फसल पर भी इसका बुरा असर पड़ा है, जिससे बाजार में चीनी की मिठास कड़वी होने लगी है और कीमतों में लगातार उछाल दर्ज किया जा रहा है।
आम उपभोक्ता पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे थे, लेकिन अब सब्जियों और रोजमर्रा के सामानों के दाम और ज्यादा तेजी से बढ़ने लगे हैं। ट्रांसपोर्टेशन में दिक्कत और मंडियों में फसल खराब होने के कारण टमाटर, प्याज और दालों के भाव आसमान छू रहे हैं। व्यापारियों का कहना है कि जब तक मौसम पूरी तरह साफ नहीं होता और नया माल सुरक्षित मंडियों तक नहीं पहुंचता, तब तक राहत की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है।
लंबी चलेगी इस बार की सर्दी और ला-नीना का नया खतरा
मौसम वैज्ञानिकों ने आने वाले महीनों को लेकर एक और बड़ी चेतावनी जारी की है। जानकारों का मानना है कि इस बार सर्दियों का मौसम बहुत लंबा खिंच सकता है। मार्च के महीने तक भी ठंड से पूरी राहत मिलने की उम्मीद कम ही दिखाई दे रही है। इसके पीछे अल नीनो के बाद अब ला-नीना के सक्रिय होने की आशंका जताई जा रही है। ला-नीना के कारण तापमान में भारी गिरावट आती है और उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड लंबे समय तक अपना डेरा जमाए रखती है।
मैदानी इलाकों में रहने वाले लोगों और खासकर दिहाड़ी मजदूरों को इस लंबी ठंड के लिए अभी से तैयार रहना होगा। बदलते मौसम के इस चक्र ने स्वास्थ्य सेवाओं के सामने भी नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। अचानक तापमान घटने और बढ़ने से वायरल बुखार, सर्दी-जुकाम और सांस के मरीजों की संख्या तेजी से अस्पतालों में बढ़ रही है। प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग दोनों ही इस स्थिति पर अपनी नजर बनाए हुए हैं ताकि किसी भी आपात स्थिति से समय रहते निपटा जा सके।
भविष्य की चेतावनी और आम जनता के लिए जरूरी सलाह
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल में यह साफ हो गया है कि जलवायु परिवर्तन अब कोई दूर की बात नहीं, बल्कि हमारे दरवाजे पर दस्तक दे चुका है। मौसम का यह उतार-चढ़ाव आने वाले दिनों में हमारे खान-पान, सेहत और जेब पर भारी पड़ने वाला है। किसानों को अब पारंपरिक खेती के तरीकों को छोड़कर मौसम के हिसाब से अपनी फसलों का चक्र बदलना होगा। सरकार और कृषि वैज्ञानिकों को भी मिलकर कोई ऐसा ठोस प्लान बनाना होगा जिससे इस तरह के अचानक आने वाले मौसम के संकट से किसानों को बचाया जा सके।







