देश भर से दक्षिण-पश्चिम मानसून की आधिकारिक विदाई हो चुकी है, लेकिन इस बार का मानसून अपने पीछे जो आंकड़े और परिस्थितियां छोड़ गया है, वे आने वाले दिनों में देश के कृषि और आर्थिक ढांचे के लिए गंभीर संकट का संकेत दे रहे हैं। 'द फ्रीलान्स' की ऑन-द-ग्राउंड पड़ताल और हालिया मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, भारत का करीब 51 प्रतिशत हिस्सा इस समय सूखे या अत्यधिक कम बारिश के साए में है। यह स्थिति महज एक मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि जलवायु असंतुलन का एक खतरनाक चेहरा है जो देश के अलग-अलग हिस्सों में दोतरफा मुसीबत लेकर आया है।
चरम मौसमी विषमता: एक देश, दो विपरीत तस्वीरें
इस बार के मानसून सीजन की सबसे चौंकाने वाली बात इसकी क्षेत्रीय विषमता रही है। देश के एक बड़े हिस्से में जहां पिछले 17 से 20 सालों का सूखा रिकॉर्ड टूट गया है, वहीं कुछ चुनिंदा इलाकों में इतनी अधिक बारिश दर्ज की गई है कि पिछले दो दशकों के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त हो गए हैं। हमारी फील्ड रिपोर्टिंग टीम ने पाया कि मध्य और प्रायद्वीपीय भारत के कई जिलों में पानी की एक-एक बूंद के लिए त्राहि-त्राहि मची है, जबकि तटीय और उत्तर-पूर्वी राज्यों के कुछ हिस्सों में अत्यधिक बादलों के फटने और बाढ़ जैसी आपदाओं ने तबाही मचाई है।
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कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर मंडराता संकट
51 फीसदी क्षेत्र में सूखे जैसे हालात होने का सीधा असर देश की खरीफ फसलों और आगामी रबी सीजन की बुआई पर पड़ रहा है। बुंदेलखंड, मराठवाड़ा और विदर्भ जैसे पारंपरिक रूप से जल-संकट से जूझने वाले क्षेत्रों के अलावा इस बार उन इलाकों में भी पानी का भारी अकाल देखा गया है जिन्हें धान और अन्य मुख्य फसलों का कटोरा कहा जाता है। किसानों का कहना है कि समय पर बारिश न होने और मानसून के अचानक बेरुखी दिखाने से भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे चला गया है। बोरवेल सूख चुके हैं और सिंचाई के लिए कृत्रिम साधनों का खर्च किसानों की पहुंच से बाहर होता जा रहा है।
पेयजल सुरक्षा और अर्बन क्राइसिस की आहट
सिर्फ ग्रामीण इलाके ही नहीं, बल्कि मानसून की इस अजीब विदाई ने अर्ध-शहरी और शहरी इलाकों के लिए भी पानी का बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। जल संरक्षण और प्रबंधन के जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते एहतियाती कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले गर्मियों के महीनों में देश के महानगरों और कस्बों में गंभीर पेयजल संकट का सामना करना पड़ सकता है। भूजल का अत्यधिक दोहन और वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) के प्रति प्रशासनिक उदासीनता इस संकट को और गहरा कर रही है।
भविष्य का असर और नीतिगत चुनौतियां
- देश के 51% भूभाग में सूखे जैसे हालात से खाद्य सुरक्षा और महंगाई पर सीधा असर पड़ने की आशंका है।
- भूमिगत जल स्तर में भारी गिरावट से ग्रामीण क्षेत्रों में पशुधन और पेयजल की बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है।
- नीति निर्माताओं के सामने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पारंपरिक कृषि पद्धतियों को बदलने की बड़ी चुनौती है।
- फसल बीमा और राहत पैकेजों के वितरण में पारदर्शिता लाकर किसानों को तुरंत संबल देने की जरूरत है।
निष्कर्ष तौर पर, मानसून की यह विदाई हमारे नीतिगत तंत्र और पर्यावरण सुरक्षा के दावों पर एक बड़ा सवालिया निशान छोड़ गई है। अगर समय रहते जल प्रबंधन को लेकर ठोस राष्ट्रीय नीति नहीं बनाई गई, तो यह '51% सूखा' देश के विकास को पटरी से उतारने के लिए काफी है। 'द फ्रीलान्स' इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार ग्राउंड जीरो से नजर बनाए रखेगा।







