नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के सबसे बड़े कारोबारी घराने यानी टाटा समूह में इन दिनों हलचल बहुत तेज हो गई है। पिछले कुछ महीनों से समूह के भीतर नेतृत्व और फैसलों को लेकर खींचतान चल रही थी। अब इस विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। एक तरफ जहां टाटा संस के मुखिया एन चंद्रशेखरन के पद छोड़ने की खबरें सामने आ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ टाटा ट्रस्ट्स के मामलों को लेकर कानूनी लड़ाई भी शुरू हो गई है। आम जनता और निवेशकों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि आखिर टाटा समूह के भीतर क्या चल रहा है और इसका असर आने वाले समय में बाजार पर कैसा पड़ेगा।
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत पिछले छह महीनों से चल रहे अंदरूनी गतिरोध से हुई है। टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच अधिकारों को लेकर स्थिति साफ नहीं हो पा रही थी। इसी बीच, टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के छह महीने के गतिरोध के बाद पद छोड़ने का ऐलान सामने आया है। इस बड़े फैसले से देश के कॉर्पोरेट जगत में सन्नाटा छा गया है। जानकारों का मानना है कि इतनी बड़ी कंपनी के शीर्ष पद पर बदलाव का असर सीधे तौर पर समूह की सभी कंपनियों के कामकाज और शेयर बाजार पर पड़ सकता है।
नोएल टाटा और उनके बेटे का अदालत का रुख
इस अंदरूनी कलह में नया पेंच तब आया जब टाटा ट्रस्ट्स के उपाध्यक्ष के खिलाफ नोएल टाटा सीधे कोर्ट पहुंच गए। नोएल टाटा अपने बेटे के साथ अदालत गए हैं और उन्होंने इस मामले में याचिका दायर की है। यह विवाद मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि टाटा समूह की कंपनियों की वार्षिक आम बैठक यानी एजीएम के दौरान फैसले कौन लेगा। टाटा संस का अधिकार बड़ा माना जाए या टाटा ट्रस्ट्स का, इसको लेकर खींचतान जारी है। जब देश के सबसे बड़े घराने के लोग ही आमने-सामने आ जाएं, तो निवेशकों की चिंता बढ़ना बहुत स्वाभाविक बात है।
अदालत में मामला जाने के बाद अब सबकी नजरें न्यायपालिका के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या कोर्ट के दखल से टाटा समूह के भीतर चल रहा यह विवाद थमेगा या फिर यह और गहराएगा, यह आने वाले कुछ हफ्तों में साफ हो जाएगा। कर्मचारियों और शेयरधारकों के मन में लगातार यह डर बना हुआ है कि इस पारिवारिक और प्रबंधकीय विवाद का असर कंपनियों के रोजमर्रा के कामकाज पर न पड़े।
टाटा स्टील के साथ सहायक कंपनी का हुआ विलय
एक तरफ जहां समूह में नेतृत्व और कोर्ट-कचहरी के मामले गरमाए हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ कारोबारी मोर्चे पर बड़े फैसले भी लिए जा रहे हैं। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल यानी एनसीएलटी ने टाटा समूह की एक सहायक कंपनी के टाटा स्टील के साथ विलय को मंजूरी दे दी है। इस मंजूरी के बाद उस सहायक कंपनी का अस्तित्व खत्म हो गया है और उसके सभी शेयर भी आधिकारिक तौर पर रद्द कर दिए गए हैं। यह कदम कंपनी के कारोबार को सरल बनाने और खर्च कम करने के लिए उठाया गया है ताकि बाजार में स्थिति और मजबूत हो सके।
दिलचस्प बात यह है कि एक तरफ समूह में बड़े विवाद और घाटे की खबरें आ रही हैं, तो दूसरी तरफ टाटा के शेयरों में जोरदार तेजी भी देखने को मिल रही है। बाजार में भारी उथल-पुथल के बावजूद टाटा का एक प्रमुख शेयर छह प्रतिशत से अधिक की छलांग लगा चुका है। इससे यह साबित होता है कि भारतीय शेयर बाजार का भरोसा अभी भी टाटा के बुनियादी कामकाज और उसकी साख पर पूरी तरह कायम है।
भविष्य की रणनीति और द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल
द फ्रीलान्स की ग्राउंड टीम ने जब बाजार के जानकारों और आर्थिक विशेषज्ञों से बात की, तो उन्होंने बताया कि टाटा जैसा पुराना समूह इन झटकों को झेलने की पूरी क्षमता रखता है। हालांकि, नेतृत्व के स्तर पर स्थिरता का आना बहुत जरूरी है। जब तक एन चंद्रशेखरन के जाने के बाद साफ तस्वीर सामने नहीं आती और नोएल टाटा तथा ट्रस्ट्स का विवाद सुलझ नहीं जाता, तब तक बाजार में थोड़ी अनिश्चितता बनी रह सकती है। आम निवेशकों को सलाह दी जा रही है कि वे घबराएं नहीं और हर खबर पर पैनी नजर बनाए रखें। टाटा समूह का इतिहास रहा है कि उसने हर बड़े संकट से खुद को बाहर निकाला है और इस बार भी उम्मीद यही की जा रही है कि अंदरूनी मामलों को जल्द ही बातचीत या कानूनी प्रक्रिया के जरिए सुलझा लिया जाएगा।







