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ग्रीन कार्ड को लेकर अमेरिका का बड़ा झटका, इंफोसिस और टीसीएस समेत आठ बड़ी कंपनियों पर गिरी गाज

अमेरिका ने भारतीय आईटी सेक्टर को एक बड़ा झटका दिया है। परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम के तहत इंफोसिस, टीसीएस और विप्रो समेत आठ बड़ी कंपनियों पर शिकंजा कसा गया है। इस कार्रवाई से अमेरिका में काम कर रहे भारतीय कर्मचारियों और देश की टेक कंपनियों के भविष्य पर बड़ा असर पड़ सकता है।
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बिजनेस एवं मार्केट डेस्क, द फ्रीलांस
अर्थव्यवस्था व बाजार ब्यूरो•9 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•31
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ग्रीन कार्ड को लेकर अमेरिका का बड़ा झटका, इंफोसिस और टीसीएस समेत आठ बड़ी कंपनियों पर गिरी गाज
📷 ग्रीन कार्ड को लेकर अमेरिका का बड़ा झटका, इंफोसिस और टीसीएस समेत आठ बड़ी कंपनियों पर गिरी गाज — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • अमेरिका ने भारतीय आईटी सेक्टर को एक बड़ा झटका दिया है। परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम के तहत इंफोसिस, टीसीएस और विप्रो समेत आठ बड़ी कंपनियों पर शिकंजा कसा गया है। इस कार्रवाई से अमेरिका में काम कर रहे भारतीय कर्मचारियों और देश की टेक कंपनियों के भविष्य पर बड़ा असर पड़ सकता है।
  • इस खबर से जुड़े सभी पहलुओं की जांच और निगरानी संबंधित विभागों द्वारा की जा रही है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार इस घटनाक्रम का आम जनता पर सीधा असर पड़ सकता है।

नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — अमेरिका से भारतीय सूचना तकनीक क्षेत्र के लिए एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है। अमरीकी प्रशासन ने परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम के तहत देश की दिग्गज टेक कंपनियों पर बड़ा शिकंजा कसा है। इस ताजा कार्रवाई की चपेट में भारत की प्रमुख आईटी कंपनियां जैसे इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज यानी टीसीएस और विप्रो समेत कुल आठ बड़ी कंपनियां आ गई हैं। इस फैसले से इन कंपनियों के जरिए अमेरिका में नौकरी कर रहे हजारों भारतीय कर्मचारियों के अमेरिकी ग्रीन कार्ड पाने के रास्ते में भारी रुकावट पैदा हो गई है।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक, अमेरिकी श्रम विभाग और आव्रजन से जुड़े नियमों के तहत यह बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया गया है। परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम वह प्रक्रिया है जिसके जरिए विदेशी नागरिकों को अमेरिका में स्थायी रूप से बसने यानी ग्रीन कार्ड मिलने का रास्ता साफ होता है। जब किसी कंपनी को इस प्रक्रिया से बाहर किया जाता है या उस पर रोक लगती है, तो उसके कर्मचारियों के लिए कानूनी रूप से अमेरिकी स्थायी नागरिकता या परमानेंट रेजिडेंसी हासिल करना लगभग असंभव हो जाता है। इससे भारतीय तकनीकी प्रोफेशनल्स में भारी निराशा और चिंता का माहौल बन गया है.

आईटी कंपनियों की बढ़ती मुश्किलें और कानूनी पेचीदगियां

अमेरिका में काम कर रही भारतीय आईटी कंपनियों के लिए यह कोई पहली चुनौती नहीं है, लेकिन इस बार का झटका काफी बड़ा माना जा रहा है। एच-1बी वीजा और ग्रीन कार्ड के नियमों को लेकर अमरीकी सरकार लंबे समय से कड़े कदम उठाती रही है। जानकारों का कहना है कि स्थानीय अमेरिकी नागरिकों को रोजगार देने और विदेशी कर्मचारियों पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से यह नीतिगत बदलाव किए जा रहे हैं। जिन आठ कंपनियों पर यह गाज गिरी है, वे अमेरिका में बड़े पैमाने पर भारतीय इंजीनियरों और सॉफ्टवेयर विशेषज्ञों को काम पर रखती हैं।

कंपनियों की तरफ से इस मामले में अभी तक कोई बहुत बड़ा आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन अंदरखाने हलचल काफी तेज हो गई है। कानूनी मामलों के जानकारों का मानना है कि यदि इन कंपनियों को इस सर्टिफिकेशन प्रोग्राम से लंबे समय तक बाहर रखा जाता है, तो उनका बिजनेस मॉडल बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। अमेरिका में काम करने वाले बहुत से अनुभवी भारतीय कर्मचारी अब नौकरी बदलकर उन कंपनियों का रुख कर सकते हैं जो इन पाबंदियों के दायरे से बाहर हैं। इससे भारतीय आईटी कंपनियों के लिए कुशल कर्मचारियों को अपने साथ रोके रखना एक बहुत बड़ी चुनौती बन जाएगा।

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भारतीय अर्थव्यवस्था और टेक सेक्टर पर पड़ने वाला सीधा असर

इस पूरी कार्रवाई का सीधा असर भारत के आईटी सेक्टर और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय माना जा रहा है। अमेरिका भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनियों के लिए सबसे बड़ा और सबसे मुनाफा देने वाला बाजार है। अमेरिका से होने वाली कमाई पर ही इन बड़ी कंपनियों का भारी-भरकम कारोबार टिका हुआ है। अगर वहां वीजा और ग्रीन कार्ड के नियम इतने सख्त हो जाएंगे, तो भारतीय टेक कंपनियों के लिए अमेरिका में ऑन-साइट प्रोजेक्ट चलाना बेहद महंगा और मुश्किल हो जाएगा।

दूसरी ओर, उन हजारों भारतीय परिवारों के लिए यह मानसिक परेशानी का समय है जो पिछले कई सालों से अमेरिका में ग्रीन कार्ड मिलने का इंतजार कर रहे थे। परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन रुक जाने से उनका अमेरिकी नागरिक बनने का सपना बीच में ही अटक गया है। परिवार के भविष्य को लेकर अनिश्चितता का यह दौर कर्मचारियों की कार्यक्षमता और मानसिक स्थिति पर भी बुरा असर डाल रहा है। भारत के तकनीकी बाजार और शेयर बाजार में भी इस खबर को लेकर सुगबुगाहट शुरू हो गई है और आने वाले दिनों में इसका असर कंपनियों के शेयरों पर भी देखने को मिल सकता है।

भיвиष्य की रणनीति और द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल

इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि भारत सरकार और ये प्रभावित आईटी कंपनियां मिलकर क्या कूटनीतिक या कानूनी कदम उठाती हैं। उद्योग संगठनों का कहना है कि इस मामले को कूटनीतिक स्तर पर अमेरिकी सरकार के सामने मजबूती से उठाया जाना चाहिए ताकि भारतीय प्रोफेशनल्स के हितों की रक्षा की जा सके। अमेरिका जैसे बड़े बाजार में अपने वजूद को बचाने के लिए इन कंपनियों को अपनी रणनीति में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे मामले पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है और जैसे ही कोई नया आधिकारिक अपडेट सामने आएगा, हम सबसे पहले अपने पाठकों तक पहुंचाएंगे।

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बिजनेस एवं मार्केट डेस्क, द फ्रीलांस

सत्यापित संपादकीय डेस्क

अर्थव्यवस्था, शेयर बाजार, बजट व पर्सनल फाइनेंस टीम

द फ्रीलांस की बिजनेस डेस्क भारतीय अर्थव्यवस्था, शेयर बाजार, बजट, महंगाई, बैंकिंग, स्टार्टअप्स और आम नागरिक के घरेलू बजट पर पड़ने वाले नीतिगत प्रभावों का गहन डेटा-आधारित विश्लेषण करती है। हम निष्पक्ष, सटीक और तथ्यात्मक पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह समाचार रिपोर्ट विभिन्न प्रमाणित समाचार एजेंसियों, आधिकारिक बयानों और स्थानीय संवाददाताओं से प्राप्त इनपुट के आधार पर तैयार की जाती है।

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