नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के अलग-अलग हिस्सों में इन दिनों धान की खेती को लेकर एक अजीब और उलट-पुलट तस्वीर सामने आ रही है। एक तरफ जहां मौसम की बेरुखी और अचानक हुई भारी बारिश ने किसानों की महीनों की मेहनत पर पानी फेर दिया है, वहीं कुछ जगहों पर किसानों की सूझबूझ और चमत्कारिक रूप से फसल के बच जाने की कहानियां भी चर्चा में हैं। धान की यह फसल इस समय देश के ग्रामीण इलाकों की आर्थिक रीढ़ की हड्डी है, जिस पर लाखों परिवारों का पूरा साल टिका हुआ है। पिछले चौबीस घंटों में मौसम के बदलते मिजाज और सरकारी खरीद की तैयारियों ने किसानों की धड़कनों को तेज कर दिया है।
बिहार के दरभंगा जिले से एक बेहद हैरान करने वाली और प्रेरणादायक खबर सामने आई है। यहां के एक किसान ने असंभव लगने वाले हालात में अपनी धान की फसल को बचाकर एक अनोखी मिसाल पेश की है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस किसान का धान का खेत लगातार चौदह दिनों तक बाढ़ के पानी में डूबा रहा था। अमूमन इतने लंबे समय तक पानी में डूबे रहने पर फसल पूरी तरह सड़ जाती है और दाने काले पड़ जाते हैं। लेकिन उन्नत बीजों के इस्तेमाल और सही समय पर की गई देखभाल की वजह से इस किसान की फसल पर पानी का ज्यादा असर नहीं हुआ और दाने सुरक्षित बच गए।
जम्मू-कश्मीर और रोहतास में बेमौसम बारिश से तबाही
दरभंगा की इस सकारात्मक तस्वीर के ठीक उलट देश के दूसरे कोनों से किसानों के दर्द की दास्तानें भी आ रही हैं। जम्मू-कश्मीर के कई इलाकों में धान की फसल पूरी तरह पककर कटाई के लिए तैयार खड़ी थी, तभी अचानक आसमान से आफत बरस पड़ी। भारी बारिश के साथ हुई ओलावृष्टि ने खेतों में खड़ी सोने जैसी फसल को मिनटों में जमींदोज कर दिया। किसानों का कहना है कि अब खेती उनके लिए पूरी तरह घाटे का सौदा बन चुकी है। लागत निकालना तो दूर, इस बार खेत की जुताई और कटाई का खर्च भी पूरा होना मुश्किल नजर आ रहा है।
कुछ ऐसा ही हाल बिहार के रोहतास जिले के डेहरी इलाके का भी है, जहां तेज आंधी और झमाझम बारिश ने किसानों की नींद उड़ा दी है। आंधी इतनी तेज थी कि कई गांवों में खेतों के अंदर धान की हरी-भरी बालियां जमीन पर लेट गईं। जब धान की फसल पानी में गिर जाती है और उस पर मिट्टी लग जाती है, तो उसके दाने खराब होने लगते हैं। स्थानीय किसानों का कहना है कि अगर मौसम ने अगले कुछ दिनों तक और साथ नहीं दिया, तो उन्हें भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ेगा और बाजार में धान की गुणवत्ता पर भी सीधा असर पड़ेगा।
उत्तर प्रदेश में समर्थन मूल्य और मंडियों में उमड़ी भीड़
एक तरफ जहां मौसम किसानों की परीक्षा ले रहा है, वहीं उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए कुछ राहत भरी खबरें भी आई हैं। राज्य सरकार ने धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी में बहत्तर रुपये की बढ़ोतरी कर दी है, जिससे किसानों को कुछ आर्थिक संबल मिलने की उम्मीद जगी है। इसके अलावा प्रदेशभर में आगामी पंद्रह अक्टूबर से पांच सौ से ज्यादा सरकारी क्रय केंद्र शुरू करने की पुख्ता तैयारियां चल रही हैं। किसान इन केंद्रों पर अपनी फसल बेचकर सरकारी कीमत का लाभ उठा सकेंगे, ताकि उन्हें बिचौलियों के हाथों औने-पौने दामों पर धान न बेचना पड़े।
मंडियों और खरीद केंद्रों की तरफ जाने वाली सड़कों पर इन दिनों भारी गहमागहमी देखने को मिल रही है। उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में तो स्थिति यह हो गई कि भारी मात्रा में धान की नई आवक अचानक मंडियों में पहुंच गई। इसके चलते मुख्य जीटी रोड पर कई किलोमीटर लंबा ट्रैफिक जाम लग गया और घंटों वाहन रेंगते नजर आए। प्रशासन और स्थानीय पुलिस यातायात को सुचारू बनाने में जुटी रही, लेकिन मंडियों में उमड़ी इस भीड़ से साफ है कि किसान अपनी फसल को जल्द से जल्द बेचकर घर के जरूरी काम निपटाना चाहते हैं।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल
हमारी जमीनी पड़ताल यह बताती है कि इस सीजन में धान की खेती पूरी तरह से मौसम और सरकारी तंत्र के बीच झूल रही है। जिन किसानों के पास पक्की भंडारण क्षमता है या जिनकी फसल सुरक्षित कट चुकी है, वे तो खुश हैं। लेकिन जिनकी फसल ओले और बारिश की भेंट चढ़ गई, वे अब सरकार से मुआवजे की गुहार लगा रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि सरकारी खरीद केंद्र इन किसानों के जख्मों पर कितना मरहम लगा पाते हैं और मौसम आगे क्या नया रंग दिखाता है।





