नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश में मानसून के लौटने का समय अक्टूबर तक पूरा हो जाता है, लेकिन इस बार हालात बिल्कुल अलग हैं। मानसून की विदाई के बाद भी देश के कई राज्यों में झमाझम बारिश हो रही है। लोग हैरान हैं कि अक्टूबर और नवंबर के महीनों में यह पानी कहां से बरस रहा है। 'द फ्रीलान्स' की टीम ने जब इस पहेली को सुलझाने के लिए मौसम वैज्ञानिकों से बात की, तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
इस पूरी गडबड़ी के पीछे ग्लोबल वार्मिंग और प्रशांत महासागर में बन रही खास स्थितियां हैं। मौसम विभाग के जानकारों का कहना है कि इस बार 'सुपर अल नीनो' का असर बहुत तेज है। अल नीनो वह स्थिति है जब समुद्र का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इससे हवाओं का पूरा चक्र बिगड़ जाता है और मानसून के जाने के बाद भी बादलों के बरसने का सिलसिला नहीं रुकता।
मौसम के इस उलटफेर से क्यों लंबी चलेगी इस बार सर्दी
इस बदलते मौसम का असर केवल बारिश तक सीमित नहीं है। मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस बार सर्दी का असर बहुत लंबा खिंच सकता है। आम तौर पर फरवरी के बाद गर्मी शुरू हो जाती है, लेकिन इस बार मार्च तक सर्दी का अहसास बना रह सकता है। ला-नीना नाम का एक दूसरा समुद्री प्रभाव इस ठंड को और बढ़ा रहा है। यानी इस बार बसंत का मौसम आने में काफी देर लगेगी और लोगों को लंबे समय तक गर्म कपड़े पहनने पड़ेंगे।
खेती किसानी पर भी इस बेमौसम बारिश की भारी मार पड़ी है। जिन किसानों की फसल कटने के तैयार थी, वे खेतों में पानी भरने से बर्बाद हो गए हैं। धान की फसल को इस दौरान सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। इसके अलावा, मौसम के इस अजीब बर्ताव का असर चीनी की मिठास पर भी पड़ा है। गन्ने की पैदावार घटने से बाजार में चीनी के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, जिससे आम आदमी की रसोई का बजट बिगड़ गया है।
समुद्र की बढ़ती गर्मी कैसे चुरा रही है हमारी सेहत का पोषण
मौसम के इस बदलाव की मार सिर्फ जमीन पर नहीं, बल्कि समंदर के अंदर भी साफ दिखाई दे रही है। हाल ही में आई रिपोर्ट बताती है कि समुद्र का तापमान बढ़ने से मछलियों की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है। जो लोग सेहत के लिए मछली खाते हैं, उन्हें उससे मिलने वाला जरूरी ओमेगा-3 फैटी एसिड पूरा नहीं मिल पा रहा है। समुद्र का गर्म पानी वहां के जलीय जीवन का पूरा संतुलन बिगाड़ रहा है, जिसका सीधा असर इंसानी सेहत पर पड़ रहा है।
प्रशासन और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में मौसम के ऐसे तेवर आम बात हो सकते हैं। जलवायु परिवर्तन के इन खतरों से निपटने के लिए अब किसानों को अपनी खेती के तरीकों में बदलाव करना होगा। सरकार भी मानती है कि मौसम की इस अनिश्चितता से निपटने के लिए मजबूत रणनीति बनानी जरूरी है, वरना खाने-पीने की चीजों के दाम और किसानों की मुश्किलें लगातार बढ़ती रहेंगी।
आम जनता की परेशानी और आगे की क्या है तैयारी
जमीनी स्तर पर आम लोग इस मौसम से काफी परेशान हैं। कभी अचानक भारी बारिश तो कभी तेज गर्मी लोगों की सेहत बिगाड़ रही है। सर्दी का सीजन लंबा खिंचने से बच्चों और बुजुर्गों को खास सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है। डॉक्टर कह रहे हैं कि इस मौसम में वायरल संक्रमण तेजी से फैलते हैं, इसलिए खानपान का खास ध्यान रखना जरूरी है।
'द फ्रीलान्स' की पड़ताल यह साफ करती है कि यह सिर्फ एक बार होने वाली घटना नहीं है। धरती का तापमान जिस रफ्तार से बढ़ रहा है, उससे आने वाले सालों में मानसून और सर्दी के चक्र में और बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। वक्त आ गया है कि सरकार और आम नागरिक दोनों मिलकर इस जलवायु संकट को गंभीरता से लें और इसके असर से निपटने के लिए पुख्ता तैयारी करें।








