दिल्ली के घनी आबादी वाले सीमापुरी इलाके में हुए चार मंजिला इमारत हादसे ने एक बार फिर राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस दर्दनाक हादसे में जान गंवाने वालों की संख्या अब बढ़कर पांच हो गई है, जिससे पूरे इलाके में मातम का माहौल है। राहत और बचाव कार्यों में जुटी टीमों ने अब तक सात लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला है, लेकिन मलबे के नीचे अभी भी दो से तीन लोगों के फंसे होने की आशंका जताई जा रही है। मौके पर एनडीआरएफ, दमकल विभाग और पुलिस की टीमें लगातार मलबा हटाने और फंसे हुए लोगों को बाहर निकालने के लिए युद्धस्तर पर काम कर रही हैं।
घटनास्थल पर मौजूद चश्मदीदों और स्थानीय लोगों के मुताबिक, इमारत अचानक भरभराकर गिर पड़ी जिससे आसपास अफरा-तफरी मच गई। इस भीषण हादसे में अपनी जान गंवाने वालों में एक गर्भवती महिला भी शामिल है, जिसने मलबे के नीचे से खुद को बचाने की गुहार लगाई थी लेकिन समय पर मदद न पहुंच पाने के कारण उसकी सांसें थम गईं। इस हृदयविदारक घटना के बाद स्थानीय लोगों में भारी गुस्सा और डर का माहौल देखा जा रहा है। लोगों का आरोप है कि प्रशासन को पुरानी और जर्जर इमारतों की समय रहते सुध लेनी चाहिए थी ताकि इस तरह की अनहोनी को टाला जा सके।
भूकंप के झटकों और कमजोर नींव ने ली कई बेकसूरों की जान
प्रशासनिक स्तर पर सामने आई शुरुआती प्राथमिक जांच और तकनीकी आकलन में इस दर्दनाक हादसे की मुख्य वजह का खुलासा हुआ है। स्थानीय लोगों और अधिकारियों के दावों के अनुसार, कुछ दिन पहले दिल्ली-एनसीआर में आए भूकंप के झटकों के बाद इस पुरानी चार मंजिला इमारत में गहरी दरारें आ गई थीं। इमारत की नींव पहले से ही कमजोर थी और लगातार बढ़ रहे दबाव को वह इन नई दरारों के साथ झेल नहीं पाई। मकान मालिक और स्थानीय प्रशासन की अनदेखी का खामियाजा अंततः उन गरीब परिवारों को भुगतना पड़ा जो किराए पर या कम दाम के आशियाने की तलाश में यहां रहने को मजबूर थे।
सीमापुरी का यह इलाका काफी सघन है जहां मकान बेहद पास-पास और बिना किसी इंजीनियर या नक्शे के बनाए गए हैं। इस तरह के पुराने और जर्जर भवनों में सुरक्षा के कोई मानक नहीं अपनाए जाते हैं, जिससे मामूली आपदा या प्राकृतिक झटका भी बड़े खतरे का रूप ले लेता है। हादसे के बाद से इलाके के अन्य पुराने मकानों में रहने वाले लोग भी अपनी जान को लेकर दहशत में जीने को मजबूर हैं। वे रात के समय अपने घरों के अंदर जाने से डर रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं उनके आस-पास की इमारतें भी इसी तरह ढह न जाएं।
घने इलाकों में जर्जर इमारतों की सुरक्षा पर उठे बड़े सवाल
इस हादसे ने दिल्ली के पुराने और घने इलाकों में खड़े हो चुके अनियोजित कंक्रीट के जंगलों की हकीकत को एक बार फिर देश के सामने ला दिया है। राजधानी के कई इलाकों में ऐसी सैकड़ों इमारतें मौजूद हैं जो दशकों पुरानी हैं और अंदर से पूरी तरह खोखली हो चुकी हैं। इन इमारतों में न तो वेंटिलेशन की उचित व्यवस्था है और न ही अग्नि सुरक्षा या भूकंप रोधी तकनीक का कोई नामोनिःशानी है। इसके बावजूद स्थानीय निकाय और नगर निगम के अधिकारी बड़ी घटनाओं के होने से पहले आंखें मूंदे रहते हैं और हादसा होने के बाद केवल कागजी औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं।
दिल्ली पुलिस और जिला प्रशासन ने इस मामले में एफआईआर दर्ज कर ली है और मकान मालिक की तलाश तेज कर दी गई है। यह जांच की जा रही है कि बिना अनुमति के या अवैध तरीके से इस चार मंजिला इमारत का निर्माण किसने कराया था और इसमें व्यावसायिक गतिविधियों का संचालन हो रहा था या नहीं। जब तक दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं होती और इस तरह के जर्जर मकानों का सर्वे करके उन्हें खाली नहीं कराया जाता, तब तक ऐसे हादसों पर रोक लगाना मुमकिन नहीं होगा। 'द फ्रीलान्स' की टीम इस पूरे मामले पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगी और प्रशासन से जवाब तलब करती रहेगी।






