रूस के साइबेरिया से हाल ही में एक बड़ी खबर सामने आई है। वहां एक महिला की संदिग्ध रूप से प्लेग के कारण मौत हो गई है। इस घटना के बाद करीब दो सौ लोगों को तुरंत क्वारंटीन कर दिया गया है। इस खबर के बाहर आते ही दुनिया भर के मीडिया में चिंता की लहर दौड़ गई है। लोग यह सोचकर डर रहे हैं कि क्या यह कोई नया वैश्विक संकट बनने जा रहा है। रूस की एक प्लेग लैब और इस हालिया घटना के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ भी पूरी तरह सतर्क हो गया है।
लेकिन इस बीच राहत की बड़ी खबर यह है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस बीमारी के पूरी दुनिया में फैलने का खतरा न के बराबर है। न्यूमोनिक प्लेग सुनने में बहुत खतरनाक लगता है और इतिहास में इसके भयानक परिणाम रहे हैं। आधुनिक दौर में चिकित्सा विज्ञान बहुत आगे निकल चुका है। आज के समय में हमारे पास एंटीबायोटिक्स दवाइयां मौजूद हैं जो इस बीमारी को समय रहते आसानी से रोक सकती हैं। इसलिए घबराने की कोई जरूरत नहीं है।
रूस की घटना और दुनिया भर में फैली चिंता
रूस में हुई इस घटना के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। लोग जानना चाहते हैं कि क्या यह महामारी का रूप ले सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार प्लेग बैक्टीरिया के कारण फैलता है। यह मुख्य रूप से चूहों और अन्य जीवों के संपर्क में आने वाले पिस्सुओं से फैलता है। जब यह फेफड़ों को प्रभावित करता है तो इसे न्यूमोनिक प्लेग कहा जाता है। रूस के मामले में प्रशासन ने तुरंत एहतियात बरतते हुए प्रभावित इलाके को सील कर दिया और लोगों को अलग-थलग कर दिया ताकि संक्रमण आगे न बढ़े।
भारतीय संदर्भ में बात करें तो देश के चिकित्सा विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि भारत को अभी इस मामले में किसी तरह की विशेष चिंता करने की जरूरत नहीं है। हमारे देश में स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह मुस्तैद रहता है। हवाई अड्डों और बंदरगाहों पर अंतरराष्ट्रीय यात्राओं की कड़ी निगरानी की जाती है। यदि किसी भी देश में कोई खतरनाक संक्रमण फैलता है तो भारत सरकार तुरंत बचाव के उपाय शुरू कर देती है। ऐसे में आम नागरिकों को किसी भी तरह की अफवाह पर ध्यान नहीं देना चाहिए।
क्यों कम है न्यूमोनिक प्लेग के फैलने का खतरा
दुनिया भर के वैज्ञानिक और डॉक्टर बार-बार यह समझा रहे हैं कि प्लेग अब वह लाइलाज बीमारी नहीं रही जो सदियों पहले हुआ करती थी। आज के आधुनिक युग में स्ट्रेप्टोमाइसिन और टेट्रासाइcycline जैसी ताकतवर एंटीबायोटिक्स उपलब्ध हैं। यदि मरीज को संक्रमण के शुरुआती लक्षणों में ही ये दवाइयां दे दी जाएं तो वह पूरी तरह ठीक हो जाता है। इसके अलावा यह बीमारी कोरोना वायरस की तरह हवा में बहुत आसानी से और तेजी से नहीं फैलती है। इसके लिए संक्रमित व्यक्ति के बहुत पास संपर्क में आना जरूरी होता है।
प्रशासनिक स्तर पर भी दुनिया के सभी देश अब पहले से कहीं अधिक सतर्क और तैयार हैं। किसी भी लैब या संदिग्ध क्षेत्र में जरा सी भी लापरवाही मिलने पर अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां तुरंत एक्शन लेती हैं। डब्ल्यूएचओ खुद ऐसे मामलों पर कड़ी नजर रखता है और समय पर सही दिशा-निर्देश जारी करता है। यही मुख्य कारण है कि रूस की इस घटना को स्थानीय स्तर पर ही नियंत्रित कर लिया गया है और इसके वैश्विक महामारी बनने की कोई संभावना नहीं दिखाई दे रही है।
आम जनता के लिए जरूरी सावधानी और सीख
द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से यह साफ हो जाता है कि मीडिया में चल रही डरावनी खबरों से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। किसी भी बीमारी से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार सही जानकारी और समय पर इलाज है। सरकार और स्वास्थ्य संगठन पूरी स्थिति पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए हैं। पाठकों से अपील है कि वे सोशल मीडिया पर आने वाली अधूरी और भ्रामक जानकारियों पर विश्वास न करें और हमेशा आधिकारिक बयानों पर ही भरोसा रखें।






