नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के कई हिस्सों में इन दिनों धान की कटाई के बाद उसके सुरक्षित भंडारण यानी 'धान्य निल्लवा' को लेकर चिंताएं बहुत बढ़ गई हैं। पिछले कुछ घंटों में इंटरनेट पर इस विषय को लेकर खोज अचानक बहुत तेज हो गई है। किसान अपनी मेहनत की कमाई को बचाने के लिए परेशान घूम रहे हैं। सरकारी मंडियों और खरीद केंद्रों पर भारी भीड़ लगी हुई है। हालात यह हैं कि किसानों को अपनी उपज रखने के लिए पर्याप्त जगह नहीं मिल पा रही है।
हमारी टीम ने जब इस मामले की जमीनी पड़ताल की तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। पंजाब, हरियाणा और तेलंगाना जैसे बड़े धान उत्पादक राज्यों में गोदाम पहले से ही भरे हुए हैं। पुराने अनाज का स्टॉक अभी पूरी तरह से हटा नहीं है। ऐसे में नए धान को रखने के लिए वेयरहाउस और साइलो में जगह कम पड़ रही है। किसानों का कहना है कि अगर समय पर धान की बोरियां सुरक्षित स्थानों पर नहीं पहुंचीं तो नमी के कारण उनकी पूरी फसल खराब हो सकती है।
खुले आसमान के नीचे सड़ रहा है अन्न
मंडियों के बाहर और खुले मैदानों में हजारों बोरियां बिना किसी छत के पड़ी हुई हैं। अचानक होने वाली बारिश या खराब मौसम इन बोरियों के लिए बड़ा खतरा बन गया है। तिरपाल से ढके ये ढेर किसानों की रातों की नींद उड़ा चुके हैं। स्थानीय प्रशासन और खरीद एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी साफ दिखाई दे रही है। किसानों का आरोप है कि उन्हें अपनी उपज बेचने के लिए कई-कई दिनों तक कतारों में खड़ा रहना पड़ रहा है।
अनाज निगम के अधिकारियों का कहना है कि वे लगातार माल को दूसरे राज्यों में भेजने का काम कर रहे हैं। रेल रैक की कमी के कारण ढुलाई की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ी है। इसके बावजूद सरकार का दावा है कि किसानों के एक-एक दाने की खरीद की जाएगी। लेकिन धरातल पर स्थिति काफी संघर्षपूर्ण बनी हुई है। बिचौलिये और व्यापारी इस स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश में हैं, जिससे किसानों को औने-पौने दामों में अपनी फसल बेचने का दबाव महसूस हो रहा है।
भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए क्या कर रही है सरकार
इस संकट से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर नए गोदाम बनाने की योजनाओं पर काम कर रही हैं। आधुनिक तकनीक वाले साइलो यानी बड़े धातु के डिब्बों का निर्माण तेजी से किया जा रहा है। इनमें अनाज कई सालों तक सुरक्षित रहता है और कीड़े लगने का खतरा भी कम होता है। हालांकि, इन बड़े प्रोजेक्ट्स को पूरा होने में अभी कुछ और महीनों का समय लग सकता है, जिससे तात्कालिक राहत मिलना मुश्किल हो रहा है।
ग्रामीण इलाकों में छोटे किसान सबसे ज्यादा मुश्किल में हैं क्योंकि उनके पास अपने स्तर पर फसल बचाने का कोई ठोस साधन नहीं है। बैंक से लिया कर्ज चुकाने की चिंता और अगली बुवाई की तैयारी उनके सामने बड़े सवाल बनकर खड़े हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक आपूर्ति श्रृंखला और भंडारण व्यवस्था को पूरी तरह से डिजिटल और पारदर्शी नहीं बनाया जाता, तब तक इस तरह की समस्याएं हर साल फसल कटाई के सीजन में सामने आती रहेंगी।
खरीद केंद्रों पर किसानों की लंबी कतारें
देश की कई प्रमुख मंडियों में आज सुबह से ही किसानों का तांता लगा हुआ है। अपने ट्रैक्टरों पर धान की बोरियां लादकर पहुंचे किसान अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। कई जगहों पर तौल मशीनों के खराब होने या इंटरनेट सर्वर ठप होने की शिकायतें भी मिली हैं। इन तकनीकी अड़चनों के कारण किसानों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि तुरंत प्रभाव से व्यवस्था को सुधारा जाए ताकि किसी को भी नुकसान न उठाना पड़े।
'द फ्रीलान्स' की इस विशेष ग्राउंड रिपोर्ट से साफ है कि कागजी दावों और जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ा फासला है। धान के सुरक्षित भंडारण और समय पर उठान के लिए अभी प्रशासनिक मशीनरी को और ज्यादा मुस्तैद होना पड़ेगा। आने वाले दिनों में अगर मौसम खराब होता है तो यह संकट और भी गहरा सकता है। देश के अन्नदाता की इस दुर्दशा पर अब सियासत भी गरमाने लगी है और सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इस पर क्या ठोस कदम उठाती है।







