नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की तेज रफ्तार ने अब देश के कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वाले मिडिल मैनेजर्स यानी मध्य स्तर के अधिकारियों की नींद उड़ा दी है। पिछले कुछ दिनों से यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या आने वाले समय में कंपनियों को बड़े स्तर पर प्रबंधकों की जरूरत नहीं पड़ेगी। इस बहस को तब और हवा मिल गई जब लोकप्रिय बिजनेस रियलिटी शो शार्क टैंक के जज और जाने-माने उद्यमी अनुपम मित्तल ने इस खतरे की ओर सार्वजनिक रूप से इशारा किया। उन्होंने साफ कहा कि तकनीक इतनी ताकतवर हो रही है कि वह कर्मचारियों के बीच तालमेल बिठाने और रिपोर्ट तैयार करने वाले मैनेजरों के काम को बहुत आसानी से खुद ही संभाल सकती है।
देश के कई बड़े बिजनेस घरानों और तकनीकी एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाले दो से तीन सालों में कंपनियों के काम करने के तरीके में बहुत बड़ा बदलाव आने वाला है। जो काम पहले दर्जनों मैनेजर मिलकर करते थे और जिनकी निगरानी में पूरी टीम चलती थी, अब वह काम एआई सॉफ्टवेयर और ऑटोमेटेड टूल्स चुटकियों में कर रहे हैं। इससे कंपनियों का खर्च तो कम हो रहा है, लेकिन उन लोगों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है जो सालों से टीम लीडर या मैनेजर के रूप में काम कर रहे हैं। बाजार में यह सवाल सबसे बड़ा बन गया है कि क्या मिडिल मैनेजमेंट का पूरा ढांचा ही अब पुराना पड़ चुका है।
कॉर्पोरेट जगत में क्यों मच गई है खलबली?
शार्क टैंक जज अनुपम मित्तल के बयान के बाद सोशल मीडिया और दफ्तरों के गलियारों में इस बात पर लंबी चर्चा छिड़ गई है कि मिडिल मैनेजमेंट का भविष्य क्या होगा। जानकारों का कहना है कि एआई अब सिर्फ डेटा एनालिसिस या लिखने-पढ़ने का काम नहीं कर रहा, बल्कि यह फैसले लेने की क्षमता भी विकसित कर रहा है। पहले मिडिल मैनेजर्स का मुख्य काम ऊपरी अधिकारियों के आदेशों को नीचे तक पहुंचाना और टीम की परफॉर्मेंस की रिपोर्ट तैयार करना होता था। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सीधे तौर पर यह सारा डाटा एक क्लिक पर तैयार कर देता है। इसके चलते कंपनियों के मालिकों को यह लगने लगा है कि मध्य स्तर पर इतने सारे लोगों को वेतन देने की कोई खास तुक नहीं बनती है।
इस तकनीकी बदलाव का सबसे बुरा असर उन प्रोफेशनल्स पर पड़ रहा है जो बिना किसी तकनीकी विशेषज्ञता के केवल प्रबंधन और समन्वय के भरोसे अपनी नौकरी बचाए हुए थे। देश के प्रमुख मीडिया संस्थानों और बिजनेस रिपोर्ट्स में भी यह बात सामने आ रही है कि टेक सेक्टर से लेकर बैंकिंग और फाइनेंस तक, हर जगह छंटनी का दौर चल रहा है। कंपनियां ऐसे कर्मचारियों को प्राथमिकता दे रही हैं जो एआई टूल्स को खुद चलाना जानते हैं और कम लोगों में ज्यादा काम निकाल सकते हैं। ऐसे में जो लोग केवल कागजी कार्रवाई या मीटिंग्स तक सीमित थे, उनकी उपयोगिता लगातार कम होती जा रही है।
कंपनियों के बिजनेस मॉडल पर सीधा हमला
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि एआई अब उस सेक्टर के बिजनेस मॉडल पर सीधा हमला बोल रहा है जिसने कभी तकनीक को पाला-पोसा था। जिन कंपनियों ने पिछले कुछ सालों में ऑटोमेशन को बढ़ावा दिया, वे अब खुद अपने ही आंतरिक प्रबंधन को और ज्यादा चुस्त-दुरुस्त करने के लिए एआई का इस्तेमाल कर रही हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि मैनेजमेंट की सीढ़ी के बीच वाले पायदान पर बैठे लोगों की भूमिका बहुत सीमित हो जाएगी। कंपनियों का प्रबंधन अब सीधे सॉफ्टवेयर डैशबोर्ड के जरिए हर कर्मचारी की गतिविधियों पर नजर रख रहा है, जिससे इंसानी मैनेजर्स की जरूरत लगातार घटती जा रही है।
हालांकि, इस पूरी स्थिति का दूसरा पहलू यह भी है कि तकनीकी बदलाव अपने साथ नए तरह के अवसर भी लेकर आ रहा है। जो मैनेजर्स खुद को नई तकनीक के साथ ढाल रहे हैं और एआई का इस्तेमाल अपनी टीम की प्रोडक्टिविटी बढ़ाने के लिए कर रहे हैं, उनकी मांग अभी भी बनी हुई है। लेकिन जो लोग पुरानी कार्यशैली से बाहर नहीं निकलना चाहते, उनके लिए आने वाला समय बेहद चुनौतीपूर्ण होने वाला है। द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि कॉर्पोरेट घरानों को अब पारंपरिक डिग्री से ज्यादा एआई स्किल्स वाले लोगों की तलाश है, जिससे देश भर के कामकाजी युवाओं और अनुभवी प्रबंधकों में भारी अनिश्चितता का माहौल है।
खुद को बचाने के लिए क्या कर रहे हैं प्रोफेशनल्स?
इस मचे हड़कंप के बाद देश भर के कामकाजी लोग अपनी स्किल को अपग्रेड करने में जुट गए हैं। दफ्तरों के बाद अब कर्मचारी अलग से एआई और डेटा टूल्स के ऑनलाइन कोर्स कर रहे हैं ताकि वे अपनी नौकरी बचा सकें। जानकारों का सुझाव है कि मिडिल मैनेजर्स को अब अपनी भूमिका बदलनी होगी। उन्हें केवल फाइलें आगे बढ़ाने वाला मैनेजर बनने के बजाय एक रणनीतिक सलाहकार बनना होगा, जिसे मशीनें आसानी से रिप्लेस न कर सकें। आने वाला वक्त साफ संकेत दे रहा है कि जो खुद को बदलेगा, वही इस रेस में टिक पाएगा।








