नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश भर की अदालतों में इन दिनों मुकदमों और फैसलों का तांता लगा हुआ है। पिछले कुछ घंटों में न्यायपालिका ने कई ऐसे मामलों पर सख्त रुख अपनाया है, जो सीधे आम आदमी की जिंदगी से जुड़े हैं। पुलिस के काम करने के तरीके से लेकर नेताओं के चुनावी बयानों तक, हर मामले पर अदालतें पैनी नजर रखे हुए हैं। खासकर दक्षिण भारत से लेकर मध्य प्रदेश और उत्तर भारत तक, अदालतों के तेवर काफी कड़े नजर आ रहे हैं।
ताजा मामलों की कड़ी में सबसे बड़ी खबर पुलिस की कार्यशैली को लेकर आई है। अदालतों ने पुलिस विभाग को आड़े हाथों लेते हुए साफ कह दिया है कि जनता की सुरक्षा और सुविधा के लिए बनाई गई व्यवस्था को उत्पीड़न का जरिया न बनाया जाए। इसके अलावा, शराब की अवैध कीमतों और चुनाव के दौरान नेताओं के बयानों पर भी कानून का शिकंजा कसता जा रहा है। द फ्रीलान्स की टीम ने इन सभी मामलों की गहराई से पड़ताल की है।
चरित्र प्रमाणपत्र के नाम पर पुलिस की मनमानी पर हाईकोर्ट की फटकार
उत्तर भारत के एक उच्च न्यायालय ने पुलिस विभाग को बेहद कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने पूछा है कि पुलिस ने लोगों के चरित्र प्रमाणपत्र बनाए हैं या फिर उनके खिलाफ कोई निंदा पत्र तैयार किया है। अक्सर देखने में आता है कि नौकरी या पासपोर्ट के लिए जब लोग पुलिस सत्यापन के पास जाते हैं, तो उन्हें महीनों चक्कर काटने पड़ते हैं। कई बार बिना किसी ठोस कारण के रिपोर्ट में कमियां निकाल दी जाती हैं।
अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि पुलिस का काम नागरिकों की मदद करना है, न कि उनके रास्तों में रोड़े अटकाना। इस सख्त टिप्पणी के बाद अब पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे सत्यापन के कामों में तेजी लाएं और आम जनता को बेवजह परेशान न करें। अदालत की इस सख्ती से उन हजारों युवाओं को राहत मिलने की उम्मीद है जो कागजी कार्रवाई में फंसे रहते हैं।
तमिलनाडु में शराब की बढ़ी कीमतों और चुनावी बयानों पर न्यायिक शिकंजा
दक्षिण भारत में भी अदालतों का एक्शन जोरों पर है। तमिलनाडु से जुड़ी एक बड़ी खबर में अदालत ने शराब की बोतलों पर तय कीमत से ज्यादा पैसे वसूलने के मामले में कड़ा आदेश जारी किया है। दुकानदारों द्वारा एमआरपी से ज्यादा दाम वसूलने की शिकायतों पर अदालत ने प्रशासन को तुरंत रोक लगाने को कहा है। आम जनता लंबे समय से इस लूट से परेशान थी, जिस पर अब जाकर न्यायिक डंडा चला है।
दूसरी ओर, चुनावी माहौल के बीच नेताओं के विवादित बयानों पर भी अदालतें नजर बनाए हुए हैं। हाल ही में राजनीति में कदम रखने वाले अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके के बयानों और चुनावी गतिविधियों को लेकर भी सवाल उठे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव आयोग और अदालतों की सख्ती से इस बार नेताओं को सोच-समझकर बयानबाजी करनी होगी। कानून तोड़ने वालों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा।
मध्य प्रदेश में डॉक्टरों की लापरवाही और वकीलों पर भारी जुर्माने का मामला
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक सरकारी डॉक्टर के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया है। उस डॉक्टर पर आरोप था कि उसने एक मरीज को इलाज देने से मना कर दिया था। अदालत का मानना है कि आपात स्थिति में मरीज को मना करना गंभीर अपराध है और इस मामले में कोई नरमी नहीं बरती जा सकती। इस फैसले से चिकित्सा जगत में यह संदेश गया है कि अपनी जिम्मेदारी से भागने वाले डॉक्टरों को कानूनी परिणाम भुगतने होंगे।
एक अन्य मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने निजी विश्वविद्यालयों के नियमों पर सवाल उठाने वाले एक वकील पर पचहत्तर हजार रुपये का जुर्माना लगा दिया है। अदालत का कहना था कि बिना पुख्ता तथ्यों के अदालतों का समय बर्बाद करने वालों के खिलाफ ऐसी सख्त कार्रवाई जरूरी है। इन सभी फैसलों से यह साफ हो जाता है कि न्यायपालिका इस समय बेहद सक्रिय है और हर क्षेत्र में पारदर्शिता चाहती है।







