नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी में धरना-प्रदर्शन और नागरिकों के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई चल रही है। दिल्ली पुलिस ने अदालत के सामने अपना रुख पूरी तरह साफ कर दिया है। पुलिस का कहना है कि शहर में कानून-व्यवस्था बनाए रखना पहली प्राथमिकता है। पुलिस ने अदालत में तर्क दिया कि पहले हुए कई विरोध प्रदर्शनों में भारी हिंसा देखी गई थी। सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया था। कई पुलिसकर्मी और आम नागरिक जख्मी हुए थे। इसलिए सुरक्षा कारणों से प्रदर्शन की मंजूरी देने में कड़े नियम जरूरी हैं। अदालत में विरोध के बुनियादी अधिकार और पुलिस की शक्तियों के बीच संतुलन पर जोरदार बहस हो रही है।
दिल्ली पुलिस की ओर से पेश वकीलों ने पीठ को बताया कि पुलिस शांतिपूर्ण प्रदर्शन के खिलाफ नहीं है। लेकिन कई बार प्रदर्शनकारी तय सीमा तोड़कर सड़कों पर कब्जा कर लेते हैं। इससे आम नागरिकों का जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है। एंबुलेंस और जरूरी सेवाएं जाम में फंस जाती हैं। पुलिस ने दलील दी कि किसी भी संगठन को अराजकता फैलाने की छूट नहीं दी जा सकती। पुलिस का काम अपराध रोकना और शांति बनाए रखना है। इसलिए जब भी खुफिया सूचना मिलती है, तो सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जाते हैं। पुलिस ने पिछली घटनाओं के दस्तावेज भी अदालत के सामने रखे हैं।
इंटरनेट पाबंदी और गृह मंत्रालय का जवाब
सुनवाई के दौरान संवेदनशील मौकों पर इंटरनेट बंद करने का मुद्दा भी उठा। प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट सेवा ठप करने को लेकर गृह सचिव ने अदालत में सफाई दी है। गृह मंत्रालय की तरफ से नियमों के पालन का पूरा ब्योरा अदालत में सौंपा गया है। मंत्रालय ने यह भी माना कि इंटरनेट बंद करने के आदेश तय कानूनी दायरे में ही होने चाहिए। पुलिस ने अदालत को आश्वस्त किया कि भविष्य में ऐसे कड़े कदम केवल बेहद जरूरी हालात में ही उठाए जाएंगे। बेवजह जनता की इंटरनेट सेवा बाधित नहीं की जाएगी। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि प्रशासनिक फैसलों में पारदर्शिता होनी चाहिए।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने पुलिस की दलीलों पर कड़ा ऐतराज जताया है। उनका कहना है कि संविधान हर नागरिक को अपनी आवाज उठाने का हक देता है। शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखना लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। वकीलों ने आरोप लगाया कि पुलिस सुरक्षा के नाम पर प्रदर्शनकारियों को बेवजह रोकती है। उन्हें हिरासत में ले लिया जाता है। जंतर-मंतर या रामलीला मैदान जैसे तय स्थानों पर भी लोगों को जुटने नहीं दिया जाता। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि कानून-व्यवस्था संभालने के नाम पर लोगों के मौलिक अधिकार नहीं छीने जा सकते।
शांतिपूर्ण विरोध और जनता की सुरक्षा का संतुलन
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की बातें बहुत ध्यान से सुनीं। पीठ ने टिप्पणी की कि नागरिकों का विरोध करने का अधिकार बेहद पवित्र है। लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं हो सकता। आम जनता की सुरक्षा और शांति का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है। अदालत ने कहा कि पुलिस को हालात देखकर फैसले लेने की छूट मिलनी चाहिए। पर यह छूट मनमानी नहीं बननी चाहिए। पुलिस बल का इस्तेमाल हमेशा वाजिब और न्यायसंगत होना चाहिए। अदालत ने दोनों पक्षों से कहा कि वे ऐसे सुझाव दें जिससे दोनों बातों का संतुलन बना रहे।
राजधानी के अलग-अलग चौराहों और इलाकों पर नजर रखने वाले कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला नजीर बनेगा। जब भी कोई बड़ा संगठन आंदोलन की घोषणा करता है, तो दिल्ली पुलिस धारा 144 लागू कर देती है। कई मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए जाते हैं। बॉर्डरों पर सीमेंट के बैरिकेड लगा दिए जाते हैं। इससे रोजाना दफ्तर जाने वाले लाखों कर्मचारियों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है। अदालत इस बात पर भी गौर कर रही है कि सुरक्षा के इंतजाम आम लोगों के लिए सजा न बन जाएं।
अदालत के अगले आदेश पर टिकीं सबकी निगाहें
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल के मुताबिक, पुलिस प्रशासन अब अपनी सुरक्षा रणनीति में बदलाव की तैयारी में है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि वे आधुनिक तकनीक का सहारा लेंगे। उपद्रवियों पर नजर रखने के लिए ड्रोन कैमरों और सीसीटीवी का दायरा बढ़ाया जाएगा। इससे बेकसूर प्रदर्शनकारियों को परेशानी नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट आने वाले दिनों में इस मामले में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी कर सकता है। इन निर्देशों से तय होगा कि देश में प्रदर्शनों को लेकर पुलिस की शक्तियां कितनी रहेंगी और आम नागरिक के अधिकार कितने सुरक्षित रहेंगे।









