नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — भारतीय चुनाव आयोग इन दिनों देश की राजनीति के केंद्र में आ गया है। एक तरफ जहां मुख्य विपक्षी दल आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं, वहीं आयोग ने मतदाता सूची में फर्जीवाड़े को रोकने के लिए एक बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया है। चुनाव आयोग ने मतदाता सूची से नाम हटाने वाले फॉर्म-7 के गलत इस्तेमाल पर कड़ा पहरा लगा दिया है। अब कोई भी व्यक्ति या संगठन एक साथ सैकड़ों नाम कटवाने के लिए थोक में फॉर्म जमा नहीं कर पाएगा। आयोग का कहना है कि इस फैसले से असली मतदाताओं के अधिकार सुरक्षित रहेंगे।
देश के अलग-अलग राज्यों से लगातार शिकायतें आ रही थीं कि चुनावों से ठीक पहले असली वोटरों के नाम चुपचाप कटवा दिए जाते हैं। कई बार स्थानीय स्तर पर शरारती तत्व दर्जनों फॉर्म-7 भरकर बीएलओ के पास जमा कर देते थे। इसके चलते सामान्य लोगों को मतदान के दिन पोलिंग बूथ पर जाकर पता चलता था कि उनका नाम सूची में है ही नहीं। इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए आयोग ने साफ निर्देश जारी किए हैं कि अब प्रत्येक आवेदन की गहन पड़ताल होगी और कोई भी संदिग्ध थोक आवेदन स्वीकार नहीं किया जाएगा।
वोट काटने वाले फॉर्म-7 पर चुनाव आयोग ने लगाई कड़ी पाबंदी
चुनाव आयोग द्वारा जारी नए दिशा-निर्देशों के मुताबिक अब फॉर्म-7 दाखिल करने की प्रक्रिया को बेहद सख्त बना दिया गया है। पहले राजनीतिक दल या स्थानीय कार्यकर्ता बड़ी संख्या में लोगों के नाम कटवाने की अर्जी लगा देते थे। अब कोई भी व्यक्ति केवल अपने परिवार या बहुत करीबी दायरे में ही यह फॉर्म जमा कर सकता है। अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे का नाम कटवाने के लिए आवेदन करेगा, तो उसे ठोस सबूत देने होंगे। इसके बिना आवेदन तुरंत रद्द कर दिया जाएगा।
आयोग ने बूथ स्तर के अधिकारियों को भी कड़े निर्देश दिए हैं। हर आवेदन पर मौके पर जाकर सत्यापन करना अनिवार्य होगा। यदि किसी अधिकारी ने बिना मौके पर जाए किसी मतदाता का नाम हटाया, तो उस पर सख्त विभागीय कार्रवाई की जाएगी। जमीनी स्तर पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस कदम से अचानक वोट कटने की घटनाओं पर लगाम लगेगी। मतदाताओं को भी राहत मिलेगी कि उनका नाम बिना उनकी जानकारी के नहीं काटा जा सकेगा।
आयोग के फैसलों में मतभेद की खबरों पर आया आधिकारिक जवाब
बीते कुछ दिनों से मीडिया में ऐसी खबरें चल रही थीं कि चुनाव आयोग के भीतर फैसलों को लेकर मतभेद चल रहे हैं। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्तों के बीच कुछ अहम नीतिगत मुद्दों पर सहमति नहीं बन पा रही है। इन खबरों के सामने आते ही सियासी गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। विपक्ष ने इन खबरों को आधार बनाकर आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे।
इस पूरे विवाद पर चुनाव आयोग ने आधिकारिक बयान जारी कर स्थिति साफ की है। आयोग ने स्पष्ट किया कि पूर्ण आयोग के सभी निर्णय पूरी तरह सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों के बीच कोई आंतरिक मतभेद नहीं है। आयोग ने कहा कि मीडिया में चल रही असहमति की खबरें पूरी तरह बेबुनियाद और भ्रामक हैं। आयोग की सभी संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन पूरी पारदर्शिता और एकजुटता के साथ किया जा रहा है ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर जनता का भरोसा बना रहे।
सहयोगियों के सवाल और कांग्रेस की बैठक में रणनीति
चुनाव आयोग की भूमिका पर अब केवल विपक्षी दल ही नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के सहयोगी दल भी अपनी बात रख रहे हैं। चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और कुछ अन्य सहयोगी दलों ने भी चुनाव आयोग से कुछ प्रक्रियाओं पर स्पष्टीकरण मांगा है। इन दलों का कहना है कि मतदान और मतगणना की प्रक्रिया में कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। जनता के बीच किसी भी तरह का संशय दूर होना लोकतंत्र के लिए जरूरी है।
दूसरी ओर, दिल्ली में कांग्रेस कार्यसमिति की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई। इस बैठक में चुनाव आयोग के हालिया फैसलों और चुनावी निष्पक्षता के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की गई। पार्टी नेताओं ने आरोप लगाया कि चुनाव व्यवस्था में कई बुनियादी सुधारों की दरकार है। दक्षिण भारत के राज्यों, खासकर केरल में भी विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग के खिलाफ कड़े बयान दिए हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि वे इस मुद्दे को केवल राजनीतिक मंचों पर ही नहीं, बल्कि संसद के आगामी सत्र में भी पूरी ताकत से उठाएंगे।
मतदाताओं का भरोसा और चुनावी सुधारों की अगली राह
भारत की चुनाव व्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी और जटिल लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। इसमें करोड़ों मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं। निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव प्रणाली ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत होती है। जब भी आयोग के किसी कदम पर सवाल उठते हैं, तो उसका सीधा असर आम नागरिक के भरोसे पर पड़ता है। इसलिए आयोग द्वारा फॉर्म-7 के दुरुपयोग पर रोक लगाना एक सकारात्मक और जरूरी कदम माना जा रहा है।
आने वाले महीनों में कई राज्यों में स्थानीय और विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे समय में चुनाव आयोग पर सभी पक्षों का विश्वास बहाल रखना सबसे बड़ी चुनौती है। आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि वोटर लिस्ट की तैयारी से लेकर मतदान की पर्ची निकलने तक हर कदम पारदर्शी रहे। राजनीतिक दलों के साथ संवाद बढ़ाना और तकनीक का सही इस्तेमाल ही इन सभी विवादों को खत्म कर सकता है।








