नई दिल्ली से ग्राउंड रिपोर्ट — देश की राजधानी और कई अन्य राज्यों में इन दिनों चुनावी व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं के अधिकारों को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। एक तरफ विपक्षी दल सड़कों पर लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ अदालत के गलियारों में सन्नाटा पसरा हुआ है। यह सवाल हर आम नागरिक के मन में है कि क्या देश का मुख्य विपक्ष अब इन बड़े प्रशासनिक फैसलों के आगे बेबस हो चुका है। जमीनी हकीकत यह है कि राजनीतिक दलों के बड़े नेता जनता के बीच जाकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन अदालती मोर्चे पर वैसी आक्रामक कानूनी लड़ाई नहीं दिख रही जैसी पहले हुआ करती थी।
इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों को कानून के जरिए विशेष छूट देने का मामला सामने आया। इस नए कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गईं जिन पर अब नियमित सुनवाई चल रही है। अदालत ने केंद्र सरकार से इस मामले में जवाब तलब किया है और आने वाले दिनों में इस पर बड़ा फैसला आ सकता है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि अदालत में कानूनी दांवपेंच अपनी गति से चल रहे हैं, जबकि मैदान में सियासी तापमान लगातार उफान पर है। विपक्षी दल जनता के बीच जाकर अपनी बात रख रहे हैं और इसे लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा बता रहे हैं।
सड़कों पर उतरा विपक्ष और तेजस्वी यादव के कड़े तेवर
बिहार और दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों सियासी पारा सातवें आसमान पर है। राजद नेता तेजस्वी यादव ने चुनाव आयोग और सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए कहा है कि अगर सड़कें सुनसान हो जाएंगी तो संसद बिल्कुल आवारा हो जाएगी। उनका साफ कहना था कि जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरना और विरोध करना लोकतंत्र का सबसे बड़ा हथियार है। विपक्षी दलों का मानना है कि चुनाव से जुड़े नियमों में किए गए बदलाव निष्पक्षता पर बड़ा सवाल खड़े करते हैं। हालांकि, इन विरोध प्रदर्शनों के बीच यह भी देखा जा रहा है कि अलग-अलग दल अपनी रणनीति पर पूरी तरह एकजुट नहीं हैं, जिससे सरकार पर चौतरफा दबाव बनाने में थोड़ी कमजोरी जरूर आ रही है।
दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस के सत्याग्रह मंच की सराहना हाल ही में एनडीए के सहयोगी और एलजेपी नेता चिराग पासवान ने भी की है। चिराग पासवान ने कहा कि विरोध जताना और अपनी बात रखना अच्छी बात है, बशर्ते उसका तरीका लोकतांत्रिक हो। इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में नए समीकरणों की चर्चा शुरू हो गई है। एक तरफ जहां विपक्ष सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है, वहीं सत्ता पक्ष के भीतर से भी ऐसी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं जो यह बताती हैं कि राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक दूरियों के बावजूद कुछ मुद्दों पर संवाद के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और प्रदर्शनों पर पाबंदी की मांग
दूसरी तरफ सर्वोच्च न्यायालय में चुनाव आयोग के अधिकारियों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा और छूट को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई का दौर जारी है। कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले में केंद्र सरकार से विस्तृत हलफनामा मांगा है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि ये नियम किस आधार पर बनाए गए थे। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट परिसर के आसपास राजनीतिक प्रदर्शनों और धरनों पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग वाली एक अन्य याचिका भी चर्चा में है। अदालत इस याचिका पर भी जल्द सुनवाई करने वाली है, जिसके बाद कोर्ट परिसर के बाहर होने वाले प्रदर्शनों पर कड़े नियम लागू किए जा सकते हैं।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि आम जनता इन तमाम राजनीतिक और कानूनी लड़ाइयों से अलग अपनी रोजमर्रा की समस्याओं में उलझी है। चौक-चौराहों पर चर्चाएं तो गर्म हैं कि चुनाव संस्थाएं कितनी स्वतंत्र रह गई हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर किसी बड़े जनआंदोलन की सुगबुगाहट अभी दिखाई नहीं देती। विपक्षी दल प्रेस कॉन्फ्रेंस और रैलियों के जरिए जनता को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे को बचाने के लिए उन्हें आगे आना होगा। आने वाले हफ्तों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह राजनीतिक विरोध किस दिशा में आगे बढ़ता है।







