नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजनीति में एक बार फिर चुनाव प्रक्रियाओं और मतदाता सूचियों को लेकर घमासान छिड़ गया है। एक तरफ जहां तमाम राजनीतिक दल अपनी चुनावी तैयारियों को धार देने में लगे हैं, वहीं दूसरी तरफ चुनाव आयोग के एक नए कदम ने सियासी तापमान को अचानक बढ़ा दिया है। आयोग ने देश के 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण यानी स्पेशल रिवीजन की प्रक्रिया को शुरू करने का पूरी तरह से मन बना लिया है। इस बड़े प्रशासनिक कदम के सामने आते ही विपक्षी दलों की तरफ से तीखी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं। जमीन पर काम करने वाले हमारे संवाददाताओं के अनुसार, यह प्रक्रिया आने वाले दिनों में और अधिक राजनीतिक विवाद का केंद्र बन सकती है, क्योंकि कई राज्यों में स्थानीय चुनाव और आगामी राजनीतिक समीकरण इसी से तय होने हैं।
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब निर्वाचन आयोग ने देश के विभिन्न हिस्सों में मतदाता सूचियों में गड़बड़ियों और पुरानी सूचियों को अपडेट करने की जरूरत पर जोर दिया। नियमों के मुताबिक, हर साल या चुनाव से पहले सूचियों को दुरुस्त करना आयोग की नियमित जिम्मेदारी है, लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में इसे एक बड़े बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि इस तरह के बड़े प्रशासनिक फेरबदल से आम मतदाताओं को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर, सत्ताधारी दल का कहना है कि साफ-सुथरी मतदाता सूची हर निष्पक्ष चुनाव की पहली शर्त होती है और इसमें किसी भी तरह की राजनीति नहीं की जानी चाहिए। जनता के बीच भी इस बात को लेकर मिला-जुला रुख देखने को मिल रहा है, जहां कुछ लोग इसे जरूरी प्रशासनिक सुधार मान रहे हैं तो कुछ लोग इसे लेकर अपनी चिंताएं जाहिर कर रहे हैं।
सत्रह राज्यों में कैसे होगी पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया
चुनाव आयोग की योजना के अनुसार, इस बार कुल 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस विशेष पुनरीक्षण अभियान के दायरे में रखा गया है। जिला स्तर के प्रशासनिक अधिकारियों और बूथ लेवल अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे घर-घर जाकर डेटा का सत्यापन करें। इस काम के दौरान मृत मतदाताओं के नाम हटाने, नए युवाओं के नाम जोड़ने और पते में बदलाव जैसी सभी जरूरी प्रक्रियाओं को पूरा किया जाएगा। हर जिले के निर्वाचन अधिकारी को यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि किसी भी पात्र नागरिक का नाम सूची से न छूटे। मैदानी स्तर पर काम कर रहे कर्मचारियों का कहना है कि यह एक बेहद संवेदनशील और भारी-भरकम काम है, जिसके लिए अतिरिक्त सुरक्षा और प्रशासनिक अमले की जरूरत पड़ती है। स्थानीय स्तर पर राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता भी इस प्रक्रिया पर पैनी नजर बनाए हुए हैं ताकि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी या धांधली की शिकायत तुरंत दर्ज कराई जा सके।
प्रशासनिक सूत्रों से मिल रही जानकारी के मुताबिक, इस पूरी कवायद का मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची को पूरी तरह से पारदर्शी और त्रुटिहीन बनाना है ताकि चुनाव के समय किसी भी प्रकार के विवाद की गुंजाइश न बचे। पिछले कुछ चुनावों में कई जगहों से फर्जी मतदाताओं के नाम शामिल होने की शिकायतें लगातार सामने आ रही थीं। इन शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए ही चुनाव आयोग ने इस राष्ट्रव्यापी या बहु-राज्यीय विशेष अभियान को हरी झंडी दिखाई है। हालांकि, इतने बड़े पैमाने पर होने वाले इस सत्यापन कार्य के कारण स्थानीय प्रशासन पर काम का दबाव काफी बढ़ गया है। ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी वार्डों तक, बीएलओ यानी बूथ लेवल अधिकारियों को कड़ी धूप और अन्य प्रशासनिक बाधाओं के बीच घर-घर जाकर अपनी रिपोर्ट तैयार करनी पड़ रही है।
सियासी दलों के अपने-अपने तर्क और आरोप-प्रत्यारोप
इस पूरे मामले पर देश की सियासत में भूचाल सा आ गया है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं का आरोप है कि इस तरह के अभियान के नाम पर कई खास इलाकों के मतदाताओं को निशाना बनाया जा सकता है। उनका दावा है कि प्रशासनिक मशीनरी का गलत इस्तेमाल करके चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। विपक्षी शिविर का साफ कहना है कि चुनाव आयोग को किसी भी बड़े बदलाव से पहले सभी राजनीतिक दलों के साथ बैठक करनी चाहिए और उनकी आपत्तियों को सुनना चाहिए। दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि विपक्ष अपनी हार की बौखलाहट में संवैधानिक संस्थाओं पर बेबुनियाद सवाल खड़े कर रहा है, जो लोकतंत्र के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में मतदाता सूची का शुद्धिकरण एक बेहद जटिल और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। जब भी इस प्रक्रिया में तेजी लाई जाती है, राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू होना स्वाभाविक माना जाता है। धरातल पर स्थिति यह है कि आम नागरिक अभी भी अपनी सूचियों में नाम दर्ज कराने या सुधारने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। चुनाव आयोग के इस नए निर्देश के बाद अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि विभिन्न राज्यों में स्थानीय प्रशासन इस चुनौती से कैसे निपटता है। 'द फ्रीलान्स' की टीम इस पूरे मामले पर लगातार नजर बनाए रखेगी और ग्राउंड जीरो से हर एक अपडेट आप तक पहुंचाती रहेगी ताकि सच जनता के सामने साफ तौर पर आ सके।









