नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इन दिनों एक बार फिर से सुर्खियों में हैं। चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों और राजनीतिक दलों की तीखी प्रतिक्रियाओं के बीच उनका नाम सबसे आगे चल रहा है। इस पूरे सियासी हंगामे के बीच सोशल मीडिया और मीडिया रिपोर्ट्स में अचानक उनकी पढ़ाई और करियर की पुरानी कहानियों पर लंबी बहस छिड़ गई है। लोग जानना चाहते हैं कि आखिर एक इंजीनियर से प्रशासनिक सेवा में आए इस बड़े अधिकारी की पृष्ठभूमि कैसी रही है।
ज्ञानेश कुमार की शुरुआती जिंदगी और पढ़ाई-लिखाई किसी प्रेरणा से कम नहीं है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वे अपने समय में यूपी बोर्ड के टॉपर रह चुके हैं। इसके बाद उन्होंने देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान आईआईटी (IIT) से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। तकनीक के मैदान में अपनी मजबूत पकड़ बनाने के बाद उन्होंने प्रशासनिक सेवा की तरफ कदम बढ़ाया और आईएएस (IAS) अधिकारी बने। इसके अलावा उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से भी उच्च शिक्षा हासिल की है, जिससे उनका शैक्षणिक रिकॉर्ड बेहद मजबूत माना जाता है।
विपक्ष के निशाने पर क्यों आए मुख्य चुनाव आयुक्त?
एक तरफ जहां उनकी शैक्षणिक योग्यता की चर्चा हो रही है, वहीं दूसरी तरफ वे राजनीतिक दलों के निशाने पर भी आ गए हैं। चुनाव आयोग में फैसलों और कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष ने आयोग के शीर्ष नेतृत्व पर सवाल उठाए हैं। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि आयोग के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और कुछ बड़े फैसले एकतरफा लिए जा रहे हैं। इसी खींचतान के बीच ज्ञानेश कुमार और आयोग के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की कार्यशैली पर लगातार सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
इस पूरे विवाद के बीच चुनाव आयोग के भीतर के ताकतवर अफसरों के नामों की चर्चा भी तेज हो गई है। रिपोर्ट्स में सीमा खन्ना और मनीष गर्ग जैसे वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी बातें सामने आ रही हैं। कहा जा रहा है कि आयोग के इन अहम प्रशासनिक अधिकारियों के पास बड़े फैसले लेने की ताकत है, जिसके चलते पर्दे के पीछे की राजनीति गरमा गई है। इन चर्चाओं ने चुनाव आयोग की आंतरिक व्यवस्था को एक बार फिर जनता की नजरों के सामने ला खड़ा किया है.
दो दशक पुराना मलेशिया का मामला क्यों हुआ वायरल?
मौजूदा राजनीतिक हंगामे के बीच ज्ञानेश कुमार से जुड़ी एक पुरानी घटना भी इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रही है। करीब बीस साल पहले मलेशिया में एक इंजीनियर की आत्महत्या का मामला सामने आया था, जिसमें उस समय के एक आईएएस अधिकारी के रूप में ज्ञानेश कुमार का नाम भी चर्चा में आया था। इतने साल बीत जाने के बाद अचानक उस पुरानी घटना के दस्तावेजों और खबरों को सोशल मीडिया पर खंगाला जा रहा है, जिसे लेकर जानकार इसे राजनीतिक दबाव बनाने की एक रणनीति मान रहे हैं।
जमीनी स्तर पर और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब भी चुनाव आयोग और सरकार के बीच कोई बड़ा वैचारिक मतभेद उभरता है, तो शीर्ष अधिकारियों की व्यक्तिगत और पेशेवर पृष्ठभूमि को निशाना बनाया जाता है। ज्ञानेश कुमार के मामले में भी यही हो रहा है। उनकी शिक्षा, आईआईटी का बैकग्राउंड और पुराने मामलों को एक साथ जोड़कर हवा दी जा रही है ताकि उनके फैसलों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जा सकें।
आगामी चुनावों और प्रशासनिक निष्पक्षता पर असर
देश में आने वाले समय में कई राज्यों के चुनाव और महत्वपूर्ण राजनीतिक गतिविधियां होनी हैं। ऐसे समय में मुख्य चुनाव आयुक्त और उनके सहयोगियों पर निष्पक्षता बनाए रखने का भारी दबाव है। एक तरफ जहाँ मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि वाले अधिकारी देश की सबसे बड़ी चुनावी मशीनरी चला रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ लगातार उठ रहे सवालों ने व्यवस्था की पारदशित्ता पर भी बहस छेड़ दी है। द फ्रीलान्स की पड़ताल बताती है कि आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक तूल पकड़ सकता है, जिस पर हर देशवासी की नजर टिकी रहेगी।





