नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — रूस और यूक्रेन के बीच पिछले लंबे समय से जारी खूनी संघर्ष को रोकने के लिए अब भारत ने सीधी और सक्रिय कूटनीतिक पहल शुरू कर दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया विदेश यात्राओं और वैश्विक नेताओं के साथ हुई बैठकों के बाद, भारत ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की को तीन सूत्रीय शांति योजना सौंपी है। 'द फ्रीलान्स' की ग्राउंड पड़ताल के मुताबिक, इस शांति प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों को युद्ध के मैदान से हटाकर बातचीत की टेबल पर लाना है। दुनिया भर की नजरें इस वक्त भारत की इस मध्यस्थता पर टिकी हैं क्योंकि भारत ही इकलौता ऐसा देश है जिसके रूस और पश्चिमी देशों दोनों के साथ गहरे और भरोसेमंद रिश्ते हैं।
एक तरफ जहां कूटनीतिक स्तर पर शांति बहाल करने के प्रयास तेज हो गए हैं, वहीं दूसरी तरफ युद्ध के मैदान में तबाही थमने का नाम नहीं ले रही है। हाल ही में रूसी सेना ने यूक्रेन के सैन्य ठिकानों और ऊर्जा संरचनाओं पर सत्तर से अधिक मिसाइलें दागी हैं। इन भीषण हमलों में कम से कम ग्यारह आम नागरिकों की जान चली गई है और बिजली तथा पानी की आपूर्ति पूरी तरह चरमरा गई है। कीव में मौजूद प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि सर्दियों का मौसम नजदीक आते ही रूस के हमले और ज्यादा आक्रामक हो सकते हैं। यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने अमेरिकी दूतों के साथ अपनी हालिया बैठक में यह आशंका जताई है कि यह युद्ध आने वाली सर्दियों तक और अधिक खिंच सकता है।
पश्चिमी देशों की सैन्य मदद और रूस की कड़ी चेतावनी
युद्ध के इस माहौल के बीच पश्चिमी देशों की ओर से यूक्रेन को लगातार हथियार और तकनीकी सहायता दी जा रही है। हाल ही में ब्रिटेन के शीर्ष नेतृत्व ने कीव का अचानक दौरा किया और यूक्रेन को उन्नत क्रूज मिसाइल तकनीक देने का बड़ा ऑफर दिया है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए मास्को ने तीखा रुख अपनाया है और इसे रूस के खिलाफ सीधी उकसावे की कार्रवाई तथा तबाही का न्योता करार दिया है। रूस का साफ कहना है कि बाहरी देशों की ऐसी मदद से युद्ध का दायरा और अधिक बढ़ेगा। ऐसे समय में भारत का यह तीन सूत्रीय शांति प्लान दोनों पक्षों के बीच जारी अविश्वास की खाई को पाटने का एक आखिरी और मजबूत कूटनीतिक जरिया बनता नजर आ रहा है।
भारत के इस तीन सूत्रीय शांति प्लान की बारीकियों को समझें तो इसमें सबसे पहला जोर तुरंत संघर्ष विराम और मानवीय सहायता पर दिया गया है। दूसरे चरण में दोनों देशों की संप्रभुता का सम्मान करते हुए आपसी बातचीत के लिए सुरक्षित माहौल तैयार करने की बात कही गई है। तीसरे और अंतिम चरण में एक स्थायी शांति समझौते की रूपरेखा तैयार करने का सुझाव है ताकि भविष्य में इस तरह के संघर्ष दोबारा न उभर सकें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सार्वजनिक बयानों में भी बार-बार दोहराया है कि यह युद्ध का दौर नहीं है और समस्याओं का समाधान युद्ध के मैदान में गोलियों से नहीं बल्कि केवल बातचीत की मेज पर बैठकर ही निकल सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी के सेवाकाल के 25 वर्ष और वैश्विक कूटनीति
एक तरफ जहां भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर शांति दूत की भूमिका निभा रहा है, वहीं देश के भीतर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी बड़े मील के पत्थर तय हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सार्वजनिक सेवाकाल के पच्चीस साल पूरे कर लिए हैं। इस विशेष मौके पर अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि देश ने उन्हें बहुत कुछ दिया है और अब देश के प्रति उनका दायित्व और भी अधिक बढ़ गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री का यह मजबूत राजनीतिक रसूख ही है कि आज भारत दुनिया के दो सबसे बड़े युद्धरत देशों के बीच शांति का प्रस्ताव भेजने और उस पर गंभीर चर्चा कराने का साहस और क्षमता रखता है।
जमीनी स्तर पर काम कर रहे राजनयिक जानकारों का कहना है कि पुतिन और जेलेंस्की दोनों ही इस समय अंतरराष्ट्रीय दबाव और आंतरिक नुकसान से जूझ रहे हैं। यूक्रेन को जहां एक तरफ बुनियादी ढांचे के टूटने और ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ रहा है, वहीं रूस पर भी कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का भारी दबाव है। ऐसे में भारत का यह तीन सूत्रीय प्लान दोनों देशों के लिए एक सम्मानजनक रास्ता बन सकता है। हालांकि, कूटनीतिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि मॉस्को और कीव इस प्रस्ताव के किन बिंदुओं पर सहमति जताते हैं और पश्चिमी देश इस पहल को कितना समर्थन देते हैं।
युद्ध के बीच आम जनता का दर्द और भविष्य की राह
कीव से लेकर खारकीव तक, यूक्रेन के आम नागरिकों की जिंदगी पूरी तरह नर्क बन चुकी है। लगातार बजने वाले सायरन, रात भर बंकरों में बिताने की मजबूरी और बिजली पानी के बिना जीना वहां के लोगों की रोज की कहानी बन गया है। भारतीय पत्रकारों की टीम ने जब अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर रह रहे लोगों से बात की तो उनका दर्द साफ झलकता था। हर कोई अब इस खूनी संघर्ष का अंत चाहता है। भारत की यह पहल उन करोड़ों बेकसूर लोगों के लिए एक छोटी सी उम्मीद की किरण बनकर आई है जो रोज सुबह अगली मिसाइल गिरने के डर के साथ उठते हैं।
आगामी दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक मंचों पर भारत के इस प्रस्ताव को किस तरह स्वीकार किया जाता है। अमेरिका और यूरोपीय संघ के रुख पर भी पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं। 'द फ्रीलान्स' की यह पड़ताल जारी रहेगी और हम आपको इस शांति प्रस्ताव से जुड़ी हर अंदरूनी खबर और अपडेट लगातार पहुंचाते रहेंगे, ताकि आप तक सच की पूरी तस्वीर साफ बनी रहे।





