नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के ग्रामीण इलाकों में रोजगार की रीढ़ कहे जाने वाले मनरेगा कानून को पूरी तरह बदलने की तैयारी शुरू हो चुकी है। इसकी जगह अब नया 'जी राम जी' बिल लाया गया है, जिसके तहत रोजगार के दिनों को बढ़ाकर सौ से एक सौ पच्चीस दिन करने का दावा किया जा रहा है। सरकार का कहना है कि इस बदलाव से गांवों की तस्वीर बदल जाएगी और मजदूरों को ज्यादा काम मिलेगा। लेकिन जमीन पर उतरी हमारी टीम ने पाया कि इस नए बदलाव के आते ही शुरुआती महीने में ही ग्रामीण रोजगार के आंकड़ों में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
इस मामले पर देश भर के राजनीतिक गलियारों में घमासान मच गया है। छत्तीसगढ़ में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस नए बदलाव के विरोध में विधानसभा का घेराव करने की कोशिश की, जिसे पुलिस ने नाकाम कर दिया। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सरकार गरीब मजदूरों के हक छीनने की कोशिश कर रही है। दूसरी तरफ पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने भी केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सीधे तौर पर कहा है कि भारतीय जनता पार्टी लगातार गरीब विरोधी एजेंडा चला रही है, जिससे आम आदमी का जीवन मुश्किल हो रहा है।
ग्रामीण इलाकों में काम घटने से बढ़ी मजदूरों की चिंता
द फ्रीलान्स की टीम जब ग्रामीण इलाकों की पड़ताल करने उतरी तो वहां का माहौल काफी अलग मिला। योजना बदलने के बाद कागजी दावों के विपरीत जमीन पर काम मिलने की रफ्तार काफी धीमी हो गई है। कई गांवों के मजदूरों ने बताया कि उन्हें पिछले कई हफ्तों से कोई नया काम नहीं मिला है। मनरेगा के तहत मिलने वाला भुगतान और काम का जो पुराना ढांचा था, उसमें अचानक आए बदलाव के कारण स्थानीय स्तर पर भारी भ्रम की स्थिति बनी हुई है। पंचायत स्तर के अधिकारियों को भी नए नियमों की पूरी जानकारी नहीं है, जिसका सीधा असर गरीब मजदूरों की रोज की कमाई पर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी बड़ी योजना में बदलाव करने से पहले जमीनी स्तर पर पूरी तैयारी होनी चाहिए थी। अचानक नियम बदलने से प्रशासनिक मशीनरी में तालमेल बिगड़ गया है। गांवों में काम ठप होने से पलायन की समस्या फिर से सिर उठाने लगी है। मजदूर वर्ग असमंजस में है कि उन्हें अब अपना पुराना बकाया पैसा मिलेगा या नहीं और नए कानून के तहत आवेदन कैसे करना है। सरकार के नुमाइंदे भले ही इसे सुधार बता रहे हैं, लेकिन फिलहाल आम मजदूर के लिए यह समय बहुत कठिन साबित हो रहा है।
राजनीतिक बयानबाजी तेज और प्रशासनिक चुनौतियां बरकरार
इस पूरे घटनाक्रम पर राष्ट्रीय स्तर पर सियासत गरमाई हुई है। एक तरफ जहां सत्ता पक्ष इस बिल को ग्रामीण विकास के लिए बड़ा कदम बता रहा है, वहीं विपक्षी दल इसे गरीबों के साथ बड़ा धोखा करार दे रहे हैं। संसद से लेकर सड़क तक इस मुद्दे पर तीखी बहस देखने को मिल रही है। हालांकि, इन सियासी लड़ाइयों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आने वाले दिनों में मजदूरों को समय पर काम और पूरा मेहनताना मिल पाएगा या नहीं। प्रशासनिक स्तर पर आ रही अड़चनों को दूर करने के लिए अभी तक कोई ठोस कदम जमीन पर नजर नहीं आया है।
हमारी ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि जब तक जिला और पंचायत स्तर पर बैठे अधिकारियों को पूरी ट्रेनिंग नहीं मिलती और नियमों को सरल नहीं बनाया जाता, तब तक इस बदलाव का असर नकारात्मक ही रहेगा। मनरेगा का पुराना नेटवर्क बरसों की मेहनत से बना था, जिसे रातों-रात बदलना आसान नहीं है। मजदूरों की रोजी-रोटी सीधे तौर पर इस व्यवस्था से जुड़ी है, इसलिए सरकार को राजनीतिक बयानों से आगे बढ़कर जमीनी दिक्कतों को तुरंत सुलझाना होगा, वरना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
भविष्य की राह और द फ्रीलान्स की अंतिम पड़ताल
अंत में स्थिति यह है कि 'जी राम जी' बिल को लेकर जो वादे किए जा रहे हैं, वे फिलहाल कागजों तक ही सीमित दिखते हैं। गांवों के लोग बदलाव के इस दौर में पिस रहे हैं। हमारी टीम ने पाया कि रोजगार के मोर्चे पर जो पचास प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, वह कोई सामान्य आंकड़ा नहीं है बल्कि लाखों परिवारों की थाली से जुड़ा गंभीर संकट है। जब तक सरकार और प्रशासन मिलकर इस अंतर को नहीं पाटेंगे, तब तक गांवों की हालत में सुधार होना नामुमकिन है। द फ्रीलान्स इस मामले पर आगे भी अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा और हर एक अपडेट आप तक पहुंचाता रहेगा।








