नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी में इन दिनों राजनीतिक हलचल अपने चरम पर है। सत्ता के गलियारों से लेकर आम चौपालों तक एक ही चर्चा है कि क्या सरकार इस महीने संसद का कोई विशेष सत्र बुलाने जा रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस संभावित सत्र में देश की राजनीति की दिशा बदलने वाले कुछ बड़े और कड़े फैसले लिए जा सकते हैं। इस सुगबुगाहट के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि हाल ही में खत्म हुए मानसून सत्र के पूरे होने के काफी दिन बीत जाने के बाद भी अभी तक आधिकारिक रूप से सत्रावसान की घोषणा नहीं की गई है। जब भी सत्र का औपचारिक अंत नहीं होता है, तब ऐसे कयास लगना स्वाभाविक हो जाता है कि सरकार अचानक कोई नया दाوب चल सकती है।
विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और अंदरूनी सूत्रों के हवाले से मिल रही जानकारियों के मुताबिक, सरकार के एजेंडे में दो सबसे बड़े और संवेदनशील मुद्दे सबसे ऊपर हैं। इनमें पहला मुद्दा महिला आरक्षण को पूरी तरह लागू करने से जुड़ा है और दूसरा मुद्दा देश में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए परिसीमन यानी बाउंड्री री-ड्रॉइंग से जुड़ा हुआ है। अगर यह बिल सदन में आते हैं, तो आने वाले दिनों में चुनावी समीकरण पूरी तरह पलट सकते हैं। राजनीतिक दलों के रणनीतिकार इस बात का गुणा-गणित करने में जुट गए हैं कि यदि ऐसा कोई विशेष सत्र बुलाया जाता है, तो इसके क्या राजनीतिक नफे और नुकसान हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों के आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर भी इन अटकलों को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
संसद के विशेष सत्र की सुगबुगाहट और मानसून सत्र का सस्पेंस
संसद के कामकाज पर पैनी नजर रखने वाले जानकारों का कहना है कि सत्र का सत्रावसान न होना एक बड़ा संकेत हो सकता है। आमतौर पर सत्र खत्म होने के कुछ ही दिनों के भीतर राष्ट्रपति के आदेश से सत्रावसान की अधिसूचना जारी कर दी जाती है। लेकिन इस बार 34 दिन से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया है। इसका सीधा मतलब यह निकाला जा रहा है कि सरकार मौजूदा सत्र के पटल को ही आगे बढ़ाने या फिर अचानक एक नया और संक्षिप्त सत्र बुलाने का विकल्प खुला रखना चाहती है। इस स्थिति ने विपक्षी दलों को भी सतर्क कर दिया है और वे लगातार यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर पर्दे के पीछे क्या पक रहा है।
संसद भवन के नए परिसर में काम शुरू होने के बाद से ही कयासों का बाजार गर्म रहता है कि सरकार कोई बड़ा सरप्राइज दे सकती है। पिछले कुछ समय से जिस तरह से नीतिगत फैसले लिए गए हैं, उससे यह साफ हो गया है कि नेतृत्व चौंकाने वाले फैसले लेने से नहीं हिचकिचाता। चाहे अनुच्छेद 370 का मामला हो या फिर महिला आरक्षण बिल को पहले पास कराना हो, सरकार ने हमेशा अपने तय समय पर और बिना किसी पूर्व संकेत के बड़े कदम उठाए हैं। यही वजह है कि इस बार भी राजनीतिक दल किसी भी स्थिति से निपटने के लिए अपनी अंदरूनी बैठकें तेज कर चुके हैं और हर संभावित घटनाक्रम पर अपनी नजर गड़ाए हुए हैं।
महिला आरक्षण और परिसीमन का सियासी गणित
इस पूरी चर्चा के केंद्र में महिला आरक्षण और परिसीमन का जटिल गणित है। देश में लंबे समय से महिलाओं को विधायिका में तयशुदा हिस्सेदारी देने की मांग उठती रही है। जब पिछला बिल पास हुआ था, तब भी यह शर्त जुड़ी थी कि नई जनगणना और परिसीमन के बाद ही इसे अमलीजामा पहनाया जाएगा। अब जबकि देश में सीटों के पुनर्गठन और नई लोकसभा सीटों के सृजन की चर्चा जोर पकड़ रही है, तो यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या सरकार इन दोनों बड़े मुद्दों को एक साथ देश के सामने रखना चाहती है। यदि लोकसभा की सीटें बढ़ती हैं, तो दक्षिण और उत्तर के राज्यों के बीच सीटों के संतुलन को लेकर भी एक लंबी बहस छिड़ सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे विषय केवल प्रशासनिक या विधाई कार्य नहीं हैं, बल्कि ये सीधे तौर पर देश के मतदाता को प्रभावित करते हैं। खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे हिंदी पट्टी के बड़े राज्यों में इसका सीधा असर सीटों के समीकरण पर पड़ेगा। विपक्षी दल यह भी आशंका जता रहे हैं कि इन मुद्दों के जरिए राजनीतिक नैरेटिव को पूरी तरह बदला जा सकता है। हालांकि, जब तक सरकार की तरफ से कोई आधिकारिक बयान या बुलावा नहीं आता, तब तक ये सभी बातें केवल कयासों और राजनीतिक विश्लेषणात्मक रिपोर्टों तक ही सीमित हैं।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल
द फ्रीलान्स की टीम ने जब संसद भवन के आसपास और राजनीतिक दलों के दफ्तरों से जुड़े सूत्रों से बात की, तो यह सामने आया कि अभी तक किसी भी सांसद को औपचारिक एजेंडा नहीं मिला है। सभी सांसद और दल मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर ही अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं। हालांकि, प्रशासनिक स्तर पर इस बात की सुगबुगाहट जरूर है कि कम समय का नोटिस देकर भी संसद का सत्र आहूत किया जा सकता है। आने वाले कुछ दिनों में यह साफ हो जाएगा कि ये अटकलें महज कयास थीं या फिर वाकई देश की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत होने जा रही है। हमारी टीम इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए रखेगी और हर नए अपडेट से आपको अवगत कराती रहेगी।






