नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के दौरान होने वाली पुलिसिया कार्रवाई और उसके बाद की कानूनी प्रक्रिया पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जंतर-मंतर पर छात्रों और नागरिकों के प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा और उसके बाद हुई धड़ल्ले से गिरफ्तारियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। अदालत ने सुनवाई के दौरान सीधा सवाल पूछा कि जब कार्रवाई खुद पुलिस ने की है, तो वही विभाग अपनी जांच में निष्पक्ष कैसे हो सकता है। यह सवाल देश की न्याय व्यवस्था और पुलिस तंत्र के बीच की उस महीन रेखा को टटोलता है जहां कानून लागू करने वाले और कानून की रक्षा करने वाले एक ही खेड़े में खड़े नजर आते हैं।
इस पूरे मामले की गूंज सिर्फ अदालत के कमरों तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीन पर उतरी जनता और छात्रों के बीच भी चर्चा का बड़ा विषय बन गई है। बीते दिनों दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच जमकर टकराव हुआ था। पुलिस ने कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर कई लोगों को हिरासत में लिया और बल प्रयोग किया। लेकिन इसके ठीक उलट, कई वीडियो और रिपोर्ट सामने आई जिनमें प्रदर्शनकारियों पर एकतरफा कार्रवाई के आरोप लगे। यहां तक कि हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान एक पत्थरों से भरे ट्रक को लेकर भी अजीब स्थिति बनी, जिसे पुलिस कस्टडी में होने के बावजूद प्रदर्शनकारियों से जोड़ा गया। इन विरोधाभासी बयानों और साक्ष्यों ने अदालतों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
जंतर-मंतर हिंसा और निष्पक्ष जांच के लिए पांच सदस्यीय कमेटी का गठन
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अब एक बड़ा कदम उठाया है। अदालत ने जंतर-मंतर पर छात्रों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और उसके बाद हुई पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष जांच के लिए पांच सदस्यों वाली एक हाई पावर्ड कमेटी का गठन कर दिया है। इस कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जजों और अन्य विशेषज्ञों को शामिल किया गया है ताकि किसी भी तरह के पक्षपात की गुंजाइश न बचे। ग्राउंड पर मौजूद लोगों का कहना है कि यह कमेटी उन तमाम सवालों के जवाब तलाशेगी जो पुलिस की कार्यप्रणाली पर सीधे तौर पर सवालिया निशान लगाते हैं। लोगों का मानना है कि जब तक स्वतंत्र जांच नहीं होगी, तब तक आम जनता का भरोसा इस पूरी व्यवस्था पर बहाल होना मुश्किल है।
दूसरी ओर, इस पूरे घटनाक्रम में पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेंच ने साफ कहा है कि प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर एक नया और सख्त प्रोटोकॉल बनाया जाएगा। अदालत यह तय करेगी कि ऐसी घातक चीजों का इस्तेमाल कब, कहां और किस परिस्थिति में किया जा सकता है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों ने कोर्ट के इस कदम का स्वागत किया है। उनका कहना है कि भीड़ को नियंत्रित करने के नाम पर नागरिकों की जान जोखिम में डालने की छूट पुलिस को नहीं दी जा सकती। पुलिस और प्रशासन के पास जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, न कि उन पर बेकाबू होकर वार करने का अधिकार।
पुलिस की भूमिका और न्यायिक समीक्षा की जरूरत
कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भारतीय न्याय व्यवस्था में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकती है। अक्सर यह देखा गया है कि जब भी पुलिस पर ज्यादती के आरोप लगते हैं, तो जांच भी उसी विभाग के अधीन अफसरों द्वारा की जाती है। ऐसे में सबूतों के साथ छेड़छाड़ या लीपापोती की आशंका हमेशा बनी रहती है। 'पुलिस अपने ही मामले में जज कैसे हो सकती है' यह वाक्य सिर्फ एक सवाल नहीं, बल्कि मौजूदा व्यवस्था की उस खामी पर करारा तमाचा है जिसे वर्षों से नजरअंदाज किया जाता रहा है। अदालत के इस हस्तक्षेप से यह उम्मीद जगी है कि भविष्य में कानून का पालन कराने वाली एजेंसियां भी जवाबदेह बनेंगी और अपनी हदें नहीं भूलेंगी।
जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग के दौरान हमने पाया कि आम नागरिकों और छात्रों के मन में पुलिसई कार्रवाई को लेकर एक डर के साथ-साथ गुस्सा भी है। लोग चाहते हैं कि पुलिस सुरक्षा दे, न कि दुश्मन की तरह बर्ताव करे। हालांकि पुलिस अधिकारियों का अपना पक्ष है कि उन्हें कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कड़े कदम उठाने पड़ते हैं क्योंकि कई बार प्रदर्शन हिंसक हो जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि हिंसा की आड़ में क्या निर्दोषों को भी निशाना बनाया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट की यह पहल इसी बुनियादी सवाल का जवाब तलाशने की एक ईमानदार कोशिश है। आने वाले दिनों में जब कमेटी अपनी रिपोर्ट सौंपेगी, तब यह देखना दिलचस्प होगा कि पुलिस विभाग अपनी कार्यशैली में क्या बदलाव करता है।
पैलेट गन के इस्तेमाल पर नया प्रोटोकॉल तय करेगी अदालत
अदालत की सख्ती का असर अब प्रशासनिक हलकों में भी साफ दिखाई देने लगा है। पैलेट गन जैसे हथियारों के इस्तेमाल पर रोक लगाने या इसके लिए कड़े नियम बनाने की मांग लंबे समय से उठ रही थी। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब गृह मंत्रालय और पुलिस प्रशासन को भी एक तयशुदा दायरे में काम करना होगा। द फ्रीलान्स की टीम लगातार इस मामले पर नजर बनाए हुए है और हम यह सुनिश्चित करेंगे कि आम आदमी तक इस न्याय प्रक्रिया की हर एक सच बात पहुंचे। लोकतंत्र में जनता की आवाज को दबाने के लिए ताकत का गलत इस्तेमाल रोकना ही न्यायपालिका का असली काम है, और सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा रुख इसी दिशा में एक मजबूत कदम है।





