नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों का दौर लगातार तेज होता जा रहा है। संसद परिसर से लेकर सड़क तक विपक्षी दल और विभिन्न सामाजिक संगठन एक मंच पर उतर आए हैं। इस बीच राजनीतिक गलियारों में एक बड़ी चर्चा यह भी शुरू हो गई है कि क्या इस पूरे आंदोलन की अगुवाई को लेकर राहुल गांधी और सिविल सोसाइटी यानी सीजेपी के बीच कोई अंदरूनी खींचतान चल रही है। क्या वाकई दोनों खेमों में इस विरोध प्रदर्शन का श्रेय लेने की कोई होड़ मची हुई है, या फिर यह विपक्ष की सोची-समझी साझा रणनीति का एक हिस्सा है? इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए जब हमने जमीनी स्तर पर पड़ताल की तो कई दिलचस्प और अहम राजनीतिक पहलू सामने आए।
हाल ही में INDIA ब्लॉक की एक अहम बैठक में करीब बीस दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया था। इस बैठक का मुख्य एजेंडा ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आगामी मार्च, रैली और बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन की रूपरेखा तैयार करना था। कांग्रेस पार्टी इस पूरे आंदोलन में अपनी पुरानी आक्रामक शैली में वापस लौटती दिख रही है। राहुल गांधी खुद मोर्चे पर डटे हुए हैं और लगातार सरकार तथा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहे हैं। दूसरी ओर, सिटिज़न्स फ़ॉर जस्टिस एंड पीस यानी सीजेपी जैसे नागरिक संगठन भी इस पूरे मुद्दे पर लगातार कानूनी और सामाजिक स्तर पर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि क्या जनता के बीच इस लड़ाई का मुख्य नायक कौन है, इसको लेकर कोई असमंजस की स्थिति बन रही है।
सड़क पर कांग्रेस की चढ़ाई और विपक्षी एकजुटता का गणित
एक तरफ जहां सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर से जुड़े मामलों पर कानूनी बहस और सुनवाई चल रही है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी ने सड़क पर अपनी सियासी पकड़ मजबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी कार्यकर्ताओं ने हाल ही में कई बड़े विरोध प्रदर्शन किए हैं। कांग्रेस नेताओं का साफ कहना है कि उनका मकसद चुनाव प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना है। वे ज्ञानेश कुमार के खिलाफ उठाए जा रहे कदमों को जनता के बुनियादी अधिकारों की रक्षा से जोड़कर देख रहे हैं। हालांकि, जब बात बीस विपक्षी दलों के साझा मंच की आती है, तो क्षेत्रीय दलों के नेता अक्सर यह चाहते हैं कि किसी एक चेहरे या पार्टी को पूरे आंदोलन का इकलौता क्रेडिट न मिले। यही वजह है कि जब राहुल गांधी बहुत आक्रामक तरीके से अगुवाई करते हैं, तो कई बार सहयोगी दलों के भीतर असहजता की खबरें भी छन-छनकर बाहर आती हैं।
दूसरी ओर, नागरिक अधिकार संगठनों और सीजेपी से जुड़े कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस तरह के आंदोलनों का आधार जनहित के वे मुद्दे होते हैं जिन्हें कोई एक राजनीतिक दल अकेले अपने दम पर खड़ा नहीं कर सकता। उनका तर्क है कि लोकतंत्र को बचाने की इस लड़ाई में वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों की भूमिका उतनी ही अहम है जितनी किसी बड़े राजनेता की। जब मीडिया में यह डिबेट शुरू होती है कि कौन किस पर भारी पड़ रहा है, तो कई बार आंदोलन का मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है। सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों का कहना है कि उनका मुख्य फोकस चुनाव आयोग की स्वायत्तता की रक्षा करना है, न कि इस बात की चिंता करना कि राजनीतिक श्रेय किसके खाते में जा रहा है।
क्रेडिट की होड़ या मीडिया की बनाई गई सियासी धारणा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी और सीजेपी या अन्य सामाजिक संगठनों के बीच क्रेडिट की यह होड़ असल जमीन से ज्यादा मीडिया स्टूडियो की बहसों और राजनीतिक बयानों तक सीमित है। कांग्रेस पार्टी का यह पुराना इतिहास रहा है कि वह बड़े राष्ट्रीय मुद्दों पर सबसे आगे रहकर नेतृत्व करना चाहती है। जब राहुल गांधी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मुखर होकर बोलते हैं, तो स्वाभाविक रूप से सारी सुर्खियां उनकी तरफ चली जाती हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जमीनी स्तर पर काम कर रहे अन्य संगठन या क्षेत्रीय दल इस बात से नाराज हैं। INDIA ब्लॉक के भीतर भले ही सीट शेयरिंग या नेतृत्व को लेकर मतभेद रहे हों, लेकिन चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थानों के खिलाफ लड़ने के मुद्दे पर फिलहाल सभी दल एक सुर में बात करते नजर आ रहे हैं।
आम जनता और स्थानीय स्तर के कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस समय देश में महंगाई, बेरोजगारी और प्रशासनिक पारदर्शिता जैसे कई अन्य मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में चुनाव आयोग के खिलाफ चल रहा यह विरोध प्रदर्शन यदि सिर्फ एक नेता की छवि चमकाने तक सीमित रह गया, तो इसका दीर्घकालिक असर कमजोर हो सकता है। कांग्रेस के रणनीतिकार इस बात को अच्छी तरह समझते हैं, इसलिए वे हर प्रदर्शन में विपक्षी दलों के अन्य वरिष्ठ नेताओं को भी बराबर की जगह दे रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि यह साझा आंदोलन किस रूप में आगे बढ़ता है और क्या सरकार या चुनाव आयोग इस बढ़ते दबाव के आगे किसी प्रकार की प्रतिक्रिया देता है या नहीं।
रणनीति और भविष्य की सियासी हलचल का सच
द फ्रीलान्स की ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे इस विरोध को लेकर विपक्ष ने अपनी रणनीति में कुछ खास बदलाव किए हैं। अब केवल बयानों तक सीमित रहने के बजाय संसद से लेकर सड़क तक लगातार दबाव बनाने की योजना है। राहुल गांधी इस रणनीति के मुख्य चेहरे के रूप में उभर रहे हैं, जिससे कार्यकर्ताओं में एक नया जोश भी देखने को मिल रहा है। हालांकि, जमीनी स्तर पर समन्वय बनाए रखना विपक्ष के लिए हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। क्या आने वाले हफ्तों में यह आंदोलन और ज्यादा व्यापक रूप ले पाएगा, या फिर आपसी श्रेय की यह कथित होड़ इस एकता को कमजोर करेगी, यह आने वाला वक्त ही तय करेगा। फिलहाल, दिल्ली की सड़कों से लेकर विपक्षी दफ्तरों तक हलचल तेज है और हर कोई इस महा-संग्राम के अगले चरण का इंतजार कर रहा है।





