नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर एक बार फिर से हलचल तेज होने लगी है। किसान नेता राकेश टिकैत ने साफ कह दिया है कि किसानों की मांगें पूरी नहीं हुई हैं। सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर गारंटी कानून बनाना ही होगा। अगर सरकार समय रहते बात नहीं मानती है तो किसान फिर से दिल्ली की तरफ रुख करेंगे। इस बार आंदोलन की रणनीति में कुछ बदलाव भी किए जा सकते हैं ताकि सरकार पर सीधा दबाव बनाया जा सके।
हाल ही में राजस्थान के हनुमानगढ़ में एक बड़ी किसान पंचायत का आयोजन किया गया था। इस पंचायत में राकेश टिकैत ने किसानों से खास अपील की थी। उन्होंने कहा कि अपने ट्रैक्टरों के बंपर मजबूत रखो क्योंकि समय आने पर यही ट्रैक्टर काम आएंगे। इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। लोग यह कयास लगा रहे हैं कि क्या किसान एक बार फिर से पिछले आंदोलन की तरह बड़ा मोर्चा खोलने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि किसान नेताओं का कहना है कि वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना चाहते हैं।
जंतर-मंतर पर जुटे किसान और मराठा नेता
कुछ दिन पहले दिल्ली के जंतर-मंतर पर संयुक्त किसान मोर्चा और अन्य संगठनों का प्रदर्शन देखने को मिला था। इस प्रदर्शन में राकेश टिकैत के साथ मराठा आरक्षण आंदोलन से जुड़े नेता मनोज जरांगे पाटिल भी नजर आए थे। इन दोनों बड़े नेताओं के एक मंच पर आने से आंदोलन को एक नया मोड़ मिल गया है। ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी सीमाओं तक किसानों का यह जमावड़ा सरकार के लिए चिंता का विषय बन सकता है। दोनों नेताओं ने आपसी भाईचारे और देश के किसानों-मजदूरों के अधिकारों की बात जोर-शोर से उठाई है।
दूसरी तरफ, प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां भी पूरी तरह सतर्क हो गई हैं। पिछले आंदोलन के दौरान दिल्ली की सीमाओं पर जो ट्रैफिक और कानून व्यवस्था की स्थिति बनी थी, प्रशासन उसे दोबारा नहीं होने देना चाहता। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि अभी तक किसानों की तरफ से किसी आधिकारिक और निश्चित तारीख की घोषणा नहीं की गई है। फिर भी एहतियात के तौर पर सीमाओं पर सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा शुरू कर दी गई है ताकि किसी भी आपात स्थिति से आसानी से निपटा जा सके।
ट्रैक्टर मार्च और संसद कूच की नई तारीख
शुरुआत में किसानों के 29 नवंबर को ट्रैक्टर के साथ संसद मार्च निकालने की चर्चा थी। लेकिन विभिन्न बैठकों और आपसी मंथन के बाद इस मार्च को फिलहाल स्थगित कर दिया गया है। किसान संगठनों का कहना है कि वे जल्दबाजी में कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहते जिससे आम जनता को भारी परेशानी हो। वे सरकार को अपनी मांगों पर विचार करने के लिए और वक्त दे रहे हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि किसानों के तेवर नरम पड़ गए हैं। टिकैत ने साफ किया है कि जब तक कानून नहीं बनता, वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।
ग्रामीण इलाकों में किसानों के बीच बैठकों का दौर लगातार जारी है। युवा किसान अपने ट्रैक्टरों की मरम्मत और उन्हें तैयार करने में जुट गए हैं। टिकैत के बयानों का जमीनी असर साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। पंचायत स्तर पर लोगों को जागरूक किया जा रहा है कि वे अपनी मांगों को लेकर एकजुट रहें। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार किसानों की इन चेतावनियों पर क्या प्रतिक्रिया देती है और क्या कोई नया दौर बातचीत का शुरू हो पाता है।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल और आगे की राह
हमारी टीम ने जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के कुछ इलाकों में जाकर किसानों से बात की, तो उनका गुस्सा और निराशा दोनों साफ दिखे। किसानों का कहना है कि फसल की लागत लगातार बढ़ रही है लेकिन उस हिसाब से दाम नहीं मिल रहे हैं। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने की मांग आज भी अधूरी है। ऐसे में ट्रैक्टर मार्च का विकल्प ही उनके पास सबसे बड़ा हथियार बचा है। प्रशासन हालांकि हर स्थिति पर पैनी नजर रखे हुए है और खुफिया एजेंसियां भी पल-पल की जानकारी जुटा रही हैं।






