नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजनीति में इन दिनों मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर घमासान मचा हुआ है। इसी बीच देश के 42 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने एक साझा खुला खत जारी कर बड़ा बयान दिया है। इन पूर्व जजों ने विपक्ष की तरफ से किए जा रहे विरोध प्रदर्शनों को सीधे तौर पर लोकतंत्र पर हमला करार दिया है। जजों का यह पत्र ऐसे समय पर सामने आया है जब देश के कई राज्यों में वोटर लिस्ट दुरुस्त करने का काम चल रहा है और राजनीतिक दल इसे लेकर आमने-सामने आ गए हैं।
विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक झारखंड और पंजाब जैसे राज्यों में मतदाता सूची से नाम कटने और नए नाम जोड़ने को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। झारखंड में एसआईआर के बाद हाल ही में जो ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी हुई है, उसके अनुसार करीब 43.61 लाख लोग मतदाता सूची से बाहर हो गए हैं। इस बड़े बदलाव के बाद राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की तरफ से सवाल खड़े किए जा रहे हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए से जानबूझकर पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं, जिससे आम जनता में भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है।
बिहार से लेकर पंजाब तक घर-घर चल रहा सत्यापन अभियान
दूसरी तरफ चुनाव आयोग और प्रशासनिक अमला इस पूरी प्रक्रिया को पूरी पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ाने में जुटा है। बिहार के युवाओं के लिए एक बड़ा मौका सामने आया है जहां एक महीने तक चलने वाले विशेष वोटर रजिस्ट्रेशन ड्राइव के तहत बूथ लेवल अधिकारी यानी बीएलओ घर-घर जाकर फॉर्म-6 भरवा रहे हैं। ठीक इसी तरह पंजाब में भी आगामी पच्चीस जून से मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण अभियान शुरू होने जा रहा है। इसके लिए राज्यभर में चौबीस हजार चार सौ तिरेपन बीएलओ को तैनात किया गया है जो घर-घर जाकर मतदाताओं का भौतिक सत्यापन करेंगे ताकि सूची एकदम सटीक बन सके।
चुनाव आयोग की आंतरिक व्यवस्थाओं पर भी हाल के दिनों में काफी चर्चा देखने को मिली है। हाल ही में चुनाव आयुक्त संधू और जोशी द्वारा उठाए गए चार गंभीर सवालों पर आयोग की तरफ से सभी जरूरी जवाब आधिकारिक रूप से जारी किए गए हैं। आयोग का साफ कहना है कि मतदाता सूची को शुद्ध करने और हर पात्र नागरिक का नाम जोड़ने की यह पूरी प्रक्रिया नियमों के दायरे में रहकर पूरी निष्पक्षता से की जा रही है। इसमें किसी भी तरह की मनमानी या राजनीतिक दखलंदाजी की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है, ताकि भविष्य के चुनावों की शुचिता पूरी तरह सुरक्षित रह सके।
पूर्व जजों के कड़े रुख से गरमाई सियासत
अदालतों के इन पूर्व जजों ने अपने खुले पत्र में इस बात पर गहरी चिंता जताई है कि कुछ राजनीतिक दल अपने राजनीतिक फायदों के लिए संवैधानिक संस्थाओं पर बेवजह दबाव बना रहे हैं। उनका मानना है कि जब चुनाव आयोग स्वतंत्र रूप से मतदाता सूची में सुधार जैसे जरूरी कदम उठा रहा है, तो सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर जनता को भ्रमित करना गलत है। जजों के इस कड़े रुख के बाद देश की राजनीति में एक नई बहस छिड़ गई है जहां एक तरफ विपक्षी दल अपनी आपत्तियों पर कायम हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक सुधारों को सही ठहराने वाले पक्षों का पलड़ा भी मजबूत होता दिख रहा है।
जमीनी स्तर पर हालात यह हैं कि आम मतदाता इस पूरी कशमकश के बीच अपने कागजात और पहचान पत्र दुरुस्त कराने में लगे हैं। ब्लॉक स्तर पर तैनात कर्मचारियों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे हर घर तक पहुंचें और किसी भी असली मतदाता का नाम गलती से सूची से बाहर न होने पाए। द फ्रीलान्स की ग्राउंड टीम जब अलग-अलग इलाकों में पहुंची तो यह साफ दिखा कि प्रशासनिक अमला अपनी तरफ से पूरी चौकसी बरत रहा है, लेकिन राजनीतिक बयानों के चलते आम लोगों के मन में वोटर लिस्ट को लेकर असमंजस अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
स्वतंत्र चुनाव प्रक्रिया और लोकतंत्र का भविष्य
लोकतंत्र की मजबूती के लिए एक पारदर्शी और त्रुटिहीन मतदाता सूची का होना सबसे पहली और जरूरी शर्त माना जाता है। एसआईआर और पुनरीक्षण अभियानों के जरिए चुनाव आयोग इसी दिशा में आगे बढ़ने का दावा कर रहा है। हालांकि, राजनीतिक दलों और न्यायपालिका से जुड़े दिग्गजों के बीच छिड़ी इस तनातनी ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में चुनाव सुधारों का यह मुद्दा और अधिक तूल पकड़ सकता है। द फ्रीलान्स इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार अपनी नजर बनाए रखेगा और जमीनी सच को पाठकों तक निष्पक्ष रूप से पहुंचाता रहेगा।








