रियाद और तेल अवीव के बीच कूटनीति के गलियारों में इन दिनों एक नया भूचाल आया है। खबर है कि इजरायल ने लाल सागर और यमन के रास्ते हमला कर रहे हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब के साथ मिलकर लड़ने का प्रस्ताव रखा है। यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब पूरे मध्य पूर्व में तनाव अपने चरम पर है और हर एक देश अपने कदम बहुत ही सावधानी से रख रहा है।
सऊदी अरब के वली अहद यानी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान इस प्रस्ताव के बाद एक बड़ी उलझन में फंस गए हैं। एक तरफ सऊदी अरब यमन युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहा है और अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने पर ध्यान दे रहा है। दूसरी तरफ, हूतियों के लगातार हो रहे ड्रोन और मिसाइल हमलों से देश की सुरक्षा पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है।
प्रिंस सलमान के सामने कूटनीतिक धर्मसंकट
सऊदी अरब के लिए इजरायल के साथ खुलकर हाथ मिलाना आसान नहीं है। अरब जगत में फिलिस्तीन का मुद्दा आज भी बेहद संवेदनशील है और आम जनता की भावनाएं इसके साथ जुड़ी हुई हैं। यदि सऊदी अरब सीधे तौर पर इजरायल के साथ सैन्य मोर्चे पर खड़ा होता है, तो इस्लामिक दुनिया में उसकी छवि पर असर पड़ सकता है।
लेकिन दूसरी कड़वी सच्चाई यह भी है कि हूती विद्रोही सऊदी तेल अड्डों और व्यापारिक जहाजों को लगातार निशाना बना रहे हैं। अमेरिकी और पश्चिमी देशों के लाख प्रयासों के बाद भी हूतियों की ताकत कम नहीं हुई है। ऐसे में इजरायल की खुफिया तकनीक और सैन्य मदद सऊदी अरब के बहुत काम आ सकती है, जिसे पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
लाल सागर की सुरक्षा और बदलता क्षेत्रीय समीकरण
लाल सागर का यह समुद्री मार्ग अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए बहुत अहम है। भारत समेत दुनिया के कई देशों का आयात और निर्यात इसी रास्ते से होकर गुजरता है। हूतियों के हमलों की वजह से माल ढुलाई का खर्च बहुत बढ़ गया है और जहाजों को लंबा रास्ता चुनना पड़ रहा है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में सऊदी अरब को कोई बहुत कड़ा और बड़ा फैसला लेना होगा। ईरान समर्थित हूतियों से निपटने के लिए पर्दे के पीछे से सहयोग लेना और बात को सार्वजनिक न करना एक रास्ता हो सकता है। हालांकि, इजरायल जिस तरह खुलकर सामने आने की बात कह रहा है, उससे प्रिंस सलमान की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं।
भविष्य की रणनीति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति
अमेरिकी प्रशासन भी इस पूरे घटनाक्रम पर बहुत बारीक नजर बनाए हुए है। अमेरिका चाहता है कि खाड़ी देश आपसी मतभेद भुलाकर सुरक्षा के मोर्चे पर एकजुट हों। लेकिन पश्चिम एशिया की राजनीति इतनी सीधी नहीं है जितनी बाहर से दिखाई देती है। हर एक देश के अपने हित और अपनी मजबूरियां हैं।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, रियाद में इन दिनों लगातार उच्च स्तरीय बैठकें चल रही हैं। सऊदी नेतृत्व यह तौल रहा है कि इजरायल की मदद लेने से उसे कूटनीतिक रूप से कितना नफा या नुकसान हो सकता है। आने वाले कुछ हफ्तों में इस बात का फैसला हो जाएगा कि मध्य पूर्व का यह नया सुरक्षा समीकरण किस दिशा में आगे बढ़ेगा।








