नई दिल्ली/पश्चिम एशिया ब्यूरो — पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति में इन दिनों कूटनीति का खेल बहुत तेजी से बदल रहा है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब के सामने एक बड़ा सैन्य प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव का मकसद लाल सागर और आसपास के इलाकों में सक्रिय हूतियों के खिलाफ मिलकर हमला करना था। लेकिन सऊदी प्रिंस ने इस ऑफर को पूरी तरह ठुकरा दिया है। क्षेत्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रियाद इस समय किसी भी ऐसे बड़े सैन्य गठबंधन में शामिल होने से बच रहा है, जिससे उसकी अपनी शांति प्रक्रिया और आर्थिक विकास के प्रोजेक्ट खतरे में पड़ें।
सऊदी अरब पिछले कुछ समय से यमन के हूती विद्रोहियों के साथ शांति समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश कर रहा है। देश का मुख्य ध्यान अपने महत्वाकांक्षी विजन 2030 प्रोजेक्ट्स पर है, जिसके तहत देश की अर्थव्यवस्था को तेल से हटकर आधुनिक और सुरक्षित बनाना है। यदि सऊदी अरब इस समय इजरायल के साथ मिलकर हूतियों के खिलाफ जंग में उतर जाता, तो यमन में चल रही शांति प्रक्रिया पर पानी फिर सकता था। इसके अलावा, ईरान के साथ हाल ही में हुए कूटनीतिक समझौतों को भी झटका लग सकता था, जिसे रियाद किसी भी कीमत पर नहीं चाहता है।
इजरायल के साथ सैन्य गठजोड़ से क्यों बच रहा है रियाद?
सऊदी अरब और इजरायल के बीच पिछले साल कुछ अमेरिकी मध्यस्थता से रिश्तों को सुधारने की बात चल रही थी। लेकिन गाजा और फिलिस्तीन संकट के बाद हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। अरब जगत में इस समय इजरायल के खिलाफ जनभावनाएं काफी उग्र हैं। ऐसे वक्त में यदि सऊदी हुकूमत खुलकर इजरायल के साथ किसी सैन्य मोर्चे पर खड़ी होती है, तो उसे घरेलू और क्षेत्रीय स्तर पर भारी विरोध का सामना करना पड़ सकता है। रियाद के रणनीतिकारों का मानना है कि हूतियों से निपटने के लिए उनके पास अपने कूटनीतिक और स्थानीय सुरक्षा उपाय हैं, और उन्हें इसके लिए इजरायल की किसी भी सैन्य मदद की कोई आवश्यकता नहीं है।
दूसरी तरफ, इजरायल लगातार यह कोशिश कर रहा है कि पश्चिम एशिया के देश हूतियों के खिलाफ उसके साथ आएं। लाल सागर में मालवाहक जहाजों पर लगातार हो रहे हमलों की वजह से इजरायल की अर्थव्यवस्था और व्यापार को तगड़ा झटका लग रहा है। अमेरिकी नौसेना भी इस इलाके में हूतियों को रोकने के लिए लगातार गश्त कर रही है, लेकिन इसके बावजूद हमलों में पूरी तरह रोक नहीं लग पाई है। नेतन्याहू सरकार चाहती थी कि सऊदी अरब की ताकत का इस्तेमाल करके हूतियों के इस खतरे को हमेशा के लिए दबा दिया जाए, लेकिन रियाद के इनकार से तेल अवीव की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।
यमन शांति और क्षेत्रीय स्थिरता पर इस फैसले का असर
सऊदी अरब का यह कदम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वह अब अमेरिकी और इजरायली दबाव में आकर अपनी क्षेत्रीय नीतियों को तय नहीं करेगा। रियाद अब अपनी प्राथमिकताओं को सबसे ऊपर रख रहा है, जिसमें यमन में स्थायी शांति स्थापित करना सबसे अहम है। पिछले कई महीनों से सऊदी अधिकारियों और हूती नेताओं के बीच ओमान की मध्यस्थता से बातचीत चल रही है, जो अब अपने आखिरी दौर में है। यदि सऊदी अरब इजरायल के साथ मिलकर कोई सैन्य कार्रवाई करता, तो यह बातचीत तुरंत टूट सकती थी और यमन में एक बार फिर भीषण गृहयुद्ध शुरू हो जाने का खतरा पैदा हो जाता।
जमीनी हकीकत यह है कि पश्चिम एशिया के देश अब अपनी सुरक्षा के फैसले खुद अपने दम पर ले रहे हैं। वे किसी भी बाहरी या ऐसे सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं बनना चाहते, जो क्षेत्र में तनाव को और ज्यादा बढ़ा दे। द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से साफ है कि सऊदी प्रिंस का यह फैसला केवल एक इनकार नहीं है, बल्कि यह पश्चिम एशिया की बदलती स्वतंत्र विदेश नीति का एक बड़ा उदाहरण है, जहां आर्थिक विकास और शांति को जंग और संघर्ष से ज्यादा अहमियत दी जा रही है।






