नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — अरबपति कारोबारी एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक ने यूक्रेन में अपने सैटेलाइट इंटरनेट की स्पीड काफी कम कर दी है। इस फैसले से रूस के खिलाफ लड़ रही यूक्रेनी सेना को बड़ा झटका लगा है। युद्ध के मैदान में सेना के ड्रोन और संचार सिस्टम अचानक रुकने लगे हैं। मस्क की यही कंपनी अब भारत के बाजार में उतरने की पूरी तैयारी में है। ऐसे में भारत के रक्षा और तकनीक विशेषज्ञ इसे लेकर सतर्क हो गए हैं। विदेशी कंपनी पर देश की डिजिटल निर्भरता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
यूक्रेन के सीमावर्ती मोर्चों पर स्टारलिंक इंटरनेट सैनिकों की मुख्य ताकत बना हुआ था। यूक्रेनी सेना इसी की मदद से रूसी ठिकानों पर ड्रोन से सटीक हमले कर रही थी। जमीनी मोर्चों से आई खबरों के मुताबिक, पिछले कुछ दिनों से सिग्नल बहुत कमजोर हो गए हैं। कई संवेदनशील इलाकों में इंटरनेट की रफ्तार 80 फीसदी तक गिर गई है। इसके चलते मिसाइल और ड्रोन के लाइव वीडियो संपर्क टूटने लगे हैं। कई जगह सैन्य कमांडरों को वायरलेस सेट का सहारा लेना पड़ रहा है।
यूक्रेन के युद्ध में स्टारलिंक की गति क्यों धीमी हुई?
तकनीकी जानकारों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब मस्क ने ऐसा कदम उठाया हो। मस्क पहले भी कह चुके हैं कि उनका नेटवर्क सिर्फ आम लोगों की बातचीत के लिए है। वह अपने इंटरनेट का इस्तेमाल आक्रामक सैन्य हमलों में नहीं होने देना चाहते। रिपोर्ट के मुताबिक, स्टारलिंक ने कुछ खास युद्ध क्षेत्रों में भौगोलिक पाबंदियां लगा दी हैं। इन पाबंदियों के कारण यूक्रेनी सैनिक रूसी सीमा के भीतर ड्रोन नहीं भेज पा रहे हैं।
इस कदम से यूक्रेन की सेना में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है। सैनिकों का कहना है कि जब एक निजी कंपनी के हाथ में जंग का संचार आ जाता है, तो जोखिम बढ़ जाता है। कंपनी जब चाहे तब कनेक्शन काट सकती है या धीमा कर सकती है। इससे पूरा सैन्य अभियान एक झटके में ठप पड़ सकता है। युद्ध के बीच में इंटरनेट बंद होना हजारों सैनिकों की जान खतरे में डाल सकता है।
भारत में स्टारलिंक की दस्तक और सुरक्षा को लेकर चिंता
दूसरी तरफ, एलन मस्क भारत में स्टारलिंक इंटरनेट शुरू करने के लिए लंबे समय से प्रयास कर रहे हैं। भारत सरकार ने हाल ही में सैटेलाइट स्पेक्ट्रम बिना नीलामी के प्रशासनिक तरीके से देने का फैसला लिया है। स्टारलिंक को भारत में लाइसेंस मिलने की प्रक्रिया अब अंतिम दौर में चल रही है। लेकिन यूक्रेन में हुए इस घटनाक्रम ने भारत के सुरक्षा तंत्र को सोचने पर मजबूर कर दिया है। भारतीय विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि क्या किसी विदेशी निजी कंपनी पर निर्भर रहना सुरक्षित है?
भारत के रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आपात स्थिति में संचार व्यवस्था देश की रीढ़ होती है। अगर नियंत्रण किसी विदेशी उद्योगपति के पास होगा, तो वह कभी भी सेवा रोक सकता है। भारत की सुरक्षा एजेंसियां पहले से ही सख्त नियम बनाने पर जोर दे रही हैं। एजेंसियां चाहती हैं कि सभी सैटेलाइट डेटा का सर्वर देश के भीतर ही रहे। इसके अलावा भारत सरकार के पास नेटवर्क की पूरी निगरानी का अधिकार होना चाहिए।
घरेलू कंपनियों और स्टारलिंक के बीच बाजार की जंग
भारत में रिलायंस जियो और भारती एयरटेल जैसी देसी कंपनियां भी सैटेलाइट इंटरनेट लाने की होड़ में हैं। ये भारतीय कंपनियां लगातार बराबर नियमों और कड़े सुरक्षा मानकों की मांग कर रही हैं। उनका कहना है कि विदेशी कंपनियों को बिना कड़े नियमों के खुली छूट नहीं मिलनी चाहिए। मस्क की कंपनी दूरदराज के गांवों और पहाड़ी इलाकों में तेज इंटरनेट देने का दावा कर रही है। लेकिन डेटा की सुरक्षा और राष्ट्रीय संप्रभुता का मुद्दा सबसे बड़ा बना हुआ है।
यूक्रेन की घटना ने पूरी दुनिया को यह साफ संदेश दिया है कि संचार तकनीक किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं होनी चाहिए। भारत को अपने डिजिटल भविष्य के लिए अपने खुद के सैटेलाइट नेटवर्क को मजबूत करना होगा। भारत सरकार स्टारलिंक को अंतिम मंजूरी देने से पहले राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी कई कड़ी शर्तें जोड़ सकती है। देश के संवेदनशील इलाकों में विदेशी सैटेलाइट के इस्तेमाल पर कड़े प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।



