नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सियासत इन दिनों फिर से गरमा गई है। बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के कद्दावर नेता तेजस्वी यादव ने एक बार फिर चुनाव आयोग और उसकी कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। तेजस्वी यादव का सीधा सवाल है कि अगर चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पूरी तरह से सही थे, तो फिर चुनावों के दौरान लिए गए फैसलों में अचानक बदलाव क्यों किए गए। उन्होंने मीडिया से बातचीत के दौरान यह भी पूछा कि आखिर किसके इशारे पर चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी और कथित तौर पर डकैती की गई। तेजस्वी का यह बयान ऐसे समय आया है जब विपक्षी दल लगातार चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर मुखर बने हुए हैं और देश भर में इस पर बहस छिड़ी हुई है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच तेजस्वी यादव का अनोखा अंदाज भी चर्चा का विषय बन गया है। हाल ही में वे दिल्ली की सड़कों पर ऑटो रिक्शा की सवारी करते हुए नजर आए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लालू प्रसाद यादव के समय की याद दिलाते हुए, तेजस्वी यादव ने आम लोगों के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए यह सांकेतिक तरीका अपनाया है। उनके पिता लालू प्रसाद यादव भी कभी रिक्शा पर बैठकर विधानसभा पहुंचे थे ताकि आम जनता के साथ सीधा जुड़ाव महसूस कराया जा सके। अब उनके बेटे तेजस्वी ने भी दिल्ली की सड़कों पर ऑटो रिक्शा में सफर करके जनता का ध्यान अपनी ओर खींचा है और यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे आम आदमी की समस्याओं के साथ मजबूती से खड़े हैं।
चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठे गंभीर सवाल
तेजस्वी यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस और सार्वजनिक मंचों से सीधे तौर पर चुनाव आयोग के फैसलों पर अंगुली उठाई है। उनका कहना है कि लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए निष्पक्ष चुनाव सबसे बड़ी शर्त होते हैं। यदि देश की संवैधानिक संस्थाएं ही सवालों के घेरे में आ जाएंगी, तो आम जनता का सिस्टम से भरोसा उठ जाएगा। तेजस्वी ने कहा कि जब सड़कें सुनसान हो जाती हैं और जनता अपनी आवाज उठाना बंद कर देती है, तब देश की संसद भी अपनी जवाबदेही से दूर हो जाती है। उनका यह बयान सीधे तौर पर उन तमाम राजनीतिक फैसलों और चुनावी परिणामों पर सवालिया निशान लगाता है, जिन पर विपक्ष लगातार आपत्ति जता रहा है। दी लल्लनटॉप शो और अन्य मीडिया रिपोर्ट्स में भी इस बात की चर्चा है कि चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष का यह विरोध प्रदर्शन आगे भी जारी रह सकता है।
विपक्षी दलों का आरोप है कि चुनाव आयोग के अधिकारियों ने सत्ताधारी पार्टी के दबाव में आकर कई ऐसे फैसले लिए, जिससे विपक्षी दलों को नुकसान हुआ। तेजस्वी यादव ने विशेष रूप से ज्ञानेश कुमार का नाम लेते हुए पूछा कि उनके कार्यकाल के दौरान जो फैसले अचानक बदले गए, उनके पीछे की असली वजह क्या थी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जनता सब कुछ देख रही है और आने वाले समय में इसका जवाब चुनावों के माध्यम से दिया जाएगा। विपक्षी नेताओं का यह दल लगातार इस बात की मांग कर रहा है कि चुनाव आयोग को पूरी तरह पारदर्शी तरीके से काम करना चाहिए ताकि किसी भी दल को यह न लगे कि उसके साथ पक्षपात किया जा रहा है।
सड़कों से लेकर संसद तक गूंज रहा विरोध
राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि तेजस्वी यादव का यह आक्रामक रुख आने वाले चुनावी मौसम में कितना असरदार साबित होगा। बिहार से लेकर दिल्ली तक उनके बयानों के बाद सियासी पारा चढ़ गया है। जनता के बीच जाकर ऑटो रिक्शा की सवारी करना और आम लोगों की समस्याओं को अपनी जुबान देना, तेजस्वी की राजनीतिक रणनीति का एक अहम हिस्सा माना जा रहा है। वे लगातार यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि वे सिर्फ दफ्तरों की राजनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जमीन पर उतरकर आम जनता के संघर्षों में उनके साथ खड़े रहने के लिए तैयार हैं।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग और सत्ता पक्ष की तरफ से इन आरोपों को खारिज किया जाता रहा है। सरकार और आयोग का पक्ष है कि सभी चुनाव पूरी तरह से स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से कराए जाते हैं। लेकिन विपक्ष के तीखे सवालों और प्रदर्शनों ने इस बहस को और अधिक गहरा कर दिया है। द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर और तूल पकड़ सकता है, क्योंकि क्षेत्रीय दल लगातार एकजुट होकर चुनावी सुधारों की मांग कर रहे हैं। जनता और विश्लेषकों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या चुनाव आयोग इन सवालों के जवाब में कोई आधिकारिक सफाई पेश करता है या फिर यह राजनीतिक खींचतान यूं ही जारी रहती है।
लोकतंत्र की रक्षा के लिए जनता की भागीदारी जरूरी
तेजस्वी यादव ने अपने भाषणों में बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए हर नागरिक को जागरूक होना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि अगर आज चुनाव प्रणाली पर सवाल नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए निष्पक्ष चुनाव कराना असंभव हो जाएगा। उनका यह संदेश देश के युवाओं और आम मतदाताओं के बीच गहराई से असर कर रहा है। दिल्ली की सड़कों पर ऑटो रिक्शा की सवारी करने के दौरान भी उन्होंने कई आम चालकों और यात्रियों से बातचीत की और उनकी आर्थिक तथा सामाजिक परेशानियों को समझने की कोशिश की।
पत्रकारिता के लिहाज से यह मुद्दा सिर्फ एक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की सबसे बड़ी संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ है। जब देश के बड़े नेता चुनाव आयोग के कामकाज पर इस तरह के गंभीर आरोप लगाते हैं, तो यह लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा संकेत होता है। द फ्रीलान्स इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार अपनी नजर बनाए हुए है और आगे भी इससे जुड़े हर तथ्यात्मक अपडेट को अपने पाठकों के सामने निष्पक्षता के साथ लाता रहेगा।







