नई दिल्ली के प्रतिष्ठित प्रेस क्लब में उस समय तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन गई जब सिविल राइट्स से जुड़े एक कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों ने तीखे और सीधे सवाल पूछने शुरू कर दिए। सीजेपी यानी सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस से जुड़े अभिजीत दीपके इस दौरान मीडिया के सवालों के घेरे में आ गए। पत्रकारों ने जब उनसे नेहा बोरा और बांग्लादेश से जुड़े मामलों पर स्पष्टीकरण मांगा, तो माहौल अचानक गरमा गया। सवालों से बचने या उनका सामना करने के बजाय अभिजीत दीपके का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने वहां मौजूद पत्रकारों के लिए बेहद आपत्तिजनक और अपमानजनक टिप्पणी कर डाली।
घटना के प्रत्यक्षदर्शियों और वहां मौजूद पत्रकारों के अनुसार, जब बांग्लादेश और नेहा बोरा से जुड़े संवेदनशील विषयों पर एक के बाद एक कई सवाल दागे गए, तो अभिजीत दीपके असहज हो गए। स्थिति को संभालने के बजाय उन्होंने अपना आपा खो दिया और गुस्से में भरी प्रेस कॉन्फ्रेंस के बीच कहा कि इन लोगों को सौ-पचास का नोट देकर यहां से भगा दीजिए। उनके इस बयान ने वहां मौजूद सभी लोगों को हैरान कर दिया। एक जिम्मेदार मंच पर पत्रकारों के प्रति इस तरह की भाषा का इस्तेमाल किए जाने से प्रेस बिरादरी में भारी रोष व्याप्त हो गया है और इस बयान की चौतरफा निंदा की जा रही है।
प्रेस क्लब में तीखे सवालों से कैसे घिरे अभिजीत दीपके?
इस पूरी घटना के बाद से राष्ट्रीय राजधानी के मीडिया हलकों में राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की कार्यशैली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। पिछले कुछ समय से नेहा बोरा की पृष्ठभूमि और उनके वैचारिक जुड़ाव को लेकर विभिन्न मंचों पर चर्चाएं गर्म हैं। इससे पहले भी सोशल मीडिया और मुख्यधारा की खबरों में यह दावा किया जाता रहा है कि नेहा बोरा से जुड़े मामलों में कई तरह के विरोधाभास सामने आए हैं। जब प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसी संदर्भ में तथ्य आधारित सवाल पूछे गए, तो आयोजकों और वक्ताओं के पास इसका कोई ठोस जवाब नहीं था, जिसके चलते ऐसी आक्रामक प्रतिक्रिया देखने को मिली।
दूसरी ओर, इस पूरे घटनाक्रम पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी तेजी से सामने आ रही हैं। भाजपा और अन्य दक्षिणपंथी संगठनों ने इस बहाने वामपंथी और मानवाधिकार संगठनों पर तीखे हमले बोलने शुरू कर दिए हैं। भाजपा सांसद बांसुरी स्वराज ने भी हाल ही में विभिन्न मुद्दों पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के दोहरे रवैये को लेकर कड़े सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जब देश की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े मामलों पर जांच की मांग की जाती है, तो ये संगठन हमेशा चुप्पी साध लेते हैं या फिर इस तरह की बचकानी और अमर्यादित टिप्पणियों का सहारा लेकर भागने की कोशिश करते हैं।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ बयान और जनता की तीखी प्रतिक्रिया
अभिजीत दीपके का यह वीडियो सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर जंगल में आग की तरह फैल चुका है। एक्स और फेसबुक पर लोग इस बयान को लेकर अपनी कड़ी नाराजगी जता रहे हैं। आम जनता का मानना है कि सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले और मानवाधिकारों की बात करने वाले लोगों को प्रेस के सवालों का सामना शालीनता से करना चाहिए। पत्रकारों को पैसे देकर भगाने की बात करना न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अपमान है, बल्कि यह अहंकार को भी दर्शाता है। सोशल मीडिया पर यूजर लगातार यह मांग कर रहे हैं कि दीपके को अपने इस बयान के लिए सार्वजनिक तौर पर माफी मांगनी चाहिए।
द फ्रीलान्स की टीम ने जब इस पूरे मामले की जमीनी पड़ताल की तो यह बात सामने आई कि प्रेस क्लब जैसे खुले मंच पर इस तरह की भाषा का प्रयोग बेहद दुर्लभ और दुर्भाग्यपूर्ण है। मीडिया संगठनों और एडिटर्स गिल्ड से जुड़े कई वरिष्ठ पत्रकारों ने भी इस पर अपनी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि यदि सार्वजनिक मंचों पर इस तरह की भाषा को छूट मिलने लगी, तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के लिए अपना काम करना और भी अधिक कठिन हो जाएगा। आने वाले दिनों में इस बयान के खिलाफ कुछ कानूनी या औपचारिक शिकायतें दर्ज होने की भी पूरी संभावना जताई जा रही है।
आगे क्या होगा और इस विवाद का राजनीतिक असर
इस पूरे प्रकरण के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सीजेपी और अभिजीत दीपके इस मामले पर कोई आधिकारिक सफाई देते हैं या फिर चुप्पी साध लेते हैं। देश में जिस तरह का राजनीतिक माहौल बना हुआ है, उसमें इस तरह की बयानबाजी आने वाले चुनावों और बहसों पर भी गहरा असर डालती है। खेल के मैदान से लेकर राजनीतिक गलियारों तक, हर जगह अब इस घटना के चर्चे हो रहे हैं। एक तरफ जहां टी-सीरीज और खेल जगत की खबरें भी ट्रेंड कर रही हैं, वहीं इस विवाद ने मुख्यधारा की बहस में एक नया भूचाल ला दिया है। 'द फ्रीलान्स' इस पूरे मामले पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा और आगे आने वाले हर नए अपडेट से पाठकों को अवगत कराता रहेगा।



