दक्षिण भारत की जीवनदायिनी कही जाने वाली गोदावरी नदी इन दिनों एक बेहद दर्दनाक और डराने वाले ट्रेंड की गवाह बन रही है। पिछले कुछ हफ्तों में नदी के अलग-अलग हिस्सों से लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं जो किसी को भी अंदर तक झकझोर कर रख दें। आंध्र प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र तक लोग अपनी जीवनलीला समाप्त करने के लिए गोदावरी के उफनते बहाव को चुन रहे हैं। इस दर्दनाक सिलसिले में केवल वयस्क ही नहीं, बल्कि छोटे-छोटे मासूम बच्चों को भी मौत के मुंह में धकेला जा रहा है, जिसने समाज और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बीते दिनों सामने आई घटनाओं ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है। आंध्र प्रदेश के एक पंचायत राज इंजीनियर ने अपने परिवार के साथ नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली। गनीमत रही कि वहां मौजूद स्थानीय मछुआरों ने समय रहते उनके पोते को सुरक्षित बाहर निकाल लिया, लेकिन बाकी परिवार को बचाया नहीं जा सका। इसी तरह की एक अन्य खौफनाक घटना में महाराष्ट्र के एक शिक्षक ने अपनी कार को जानबूझकर गोदावरी नदी में गिरा दिया, जिसमें उनके दो मासूम बच्चे भी सवार थे। कार को नदी में उतारने से ठीक पहले उस शिक्षक ने अपने व्हाट्सएप स्टेटस पर अपनी इस खौफनाक योजना और उसकी वजह का खुलकर जिक्र किया था, जिससे शिक्षा विभाग और स्थानीय पुलिस प्रशासन में हड़कंप मच गया है।
रात के अंधेरे में उफनती लहरों के बीच अपनों को छोड़ देना
गोदावरी नदी के तटों पर इन दिनों सिर्फ शोक और खामोशी पसरी हुई है। एक और दिल दहलाने वाली घटना में माता-पिता ने रात के वक्त अपने तीन साल के छोटे से बच्चे को सड़क किनारे स्कूटर के पास अकेला छोड़ दिया और खुद उफनती गोदावरी में छलांग लगा दी। वह मासूम बच्चा पूरी रात उस ठंडे स्कूटर से चिपक कर रोता रहा, जिसे सुबह राहगीरों ने देखा तो उनकी रूह कांप उठी। ऐसी घटनाएं यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि इंसान मानसिक तौर पर किस हद तक टूट चुका है कि वह अपने खून और अपने भविष्य यानी अपनी ही संतानों को भी इस तरह बेसहारा छोड़कर मौत को गले लगा रहा है।
इन सभी घटनाओं में एक बात जो सबसे ज्यादा कॉमन और चिंताजनक है, वह है मानसिक तनाव और सोशल मीडिया पर अपनी बात कहकर कदम उठाना। कई मामलों में देखा गया है कि लोग अपनी परेशानियों, कर्ज या पारिवारिक कलह को व्हाट्सएप स्टेटस के जरिए दुनिया को बताते हैं और फिर सीधा नदी का रुख करते हैं। गोदावरी का विशाल पाट और इसका तेज बहाव ऐसे लोगों के लिए आत्महत्या का सबसे आसान जरिया बनता जा रहा है। नदी के पुलों पर न तो पर्याप्त सुरक्षा गार्ड हैं और न ही ऐसे लोगों को रोकने के लिए कोई त्वरित सर्विलांस सिस्टम काम कर रहा है, जिससे हादसों का यह दौर लगातार बढ़ता जा रहा है।
झारखंड के गिरिडीह से लेकर दक्षिण तक पानी में खत्म होती जिंदगियां
यह संकट सिर्फ दक्षिण तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के दूसरे हिस्सों की नदियों में भी ऐसे दुखद हादसे सामने आ रहे हैं। हाल ही में झारखंड के गिरिडीह इलाके में होली के जश्न के दौरान गोदावरी या स्थानीय जल स्रोतों में डूबने से युवकों की मौत के मामले सामने आए। हालांकि वे हादसे थे, लेकिन पानी में डूबकर जान गंवाने का यह सिलसिला लगातार गहराता जा रहा है। स्थानीय प्रशासन और पुलिस के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन त्रासदियों को कैसे रोका जाए और लोगों के बीच बढ़ रहे मानसिक अवसाद को समय रहते कैसे पहचाना जाए।
नदी के किनारों पर रहने वाले स्थानीय लोग और गोदावरी के नाविक अब खुद इन घटनाओं से गहरे सदमे में हैं। मछुआरों का कहना है कि वे हर रोज किसी न किसी को बचाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कई बार पानी का बहाव इतना तेज होता है कि चाहकर भी वे जान नहीं बचा पाते। प्रशासन अब नदी के प्रमुख पुलों और घाटों पर सीसीटीवी कैमरे लगाने और पुलिस गश्त बढ़ाने की बात कह रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह उपाय उन टूटे हुए दिलों को जोड़ पाएगा जो अंदर ही अंदर घुटकर इस खौफनाक रास्ते को चुन रहे हैं?
मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और समाज की उदासीनता
इस पूरे मामले की गहराई से पड़ताल करने पर यह साफ हो जाता है कि हमारे समाज में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अभी भी बहुत बड़ी अनदेखी हो रही है। लोग जब आर्थिक तंगी, नौकरी के तनाव या पारिवारिक विवादों में फंसते हैं, तो उन्हें आसपास कोई ऐसा मददगार नहीं मिलता जो उनका हाथ थाम सके। गोदावरी नदी के ये पुल और ये पानी सिर्फ एक भौगोलिक संरचना हैं, असल समस्या हमारे समाज के भीतर पनप रहा वह अकेलापन और मानसिक दबाव है जिसे समय रहते काउंसलर या अपनों का साथ न मिलने पर लोग खौफनाक अंत तक ले जाते हैं।
द फ्रीलान्स की टीम जब ग्राउंड पर उतरी तो यह महसूस हुआ कि अब समय आ गया है कि सरकार जिला स्तर पर ऐसे हेल्पलाइन सेंटर और नाइट पेट्रोलिंग बढ़ाए जो संकट में फंसे लोगों की पहचान कर सकें। मीडिया और आम जनता को भी यह समझना होगा कि आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं है। गोदावरी जो कभी जीवन और आस्था का प्रतीक हुआ करती थी, आज उसे इस दर्दनाक छवि से बाहर निकालने के लिए समाज और सरकार दोनों को मिलकर ठोस और संवेदनशील कदम उठाने होंगे, ताकि किसी और मासूम बच्चे को यूं रात के अंधेरे में अकेला न छोड़ना पड़े।








