नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी दिल्ली में विपक्षी दलों के साझा मोर्चे यानी 'इंडिया' गठबंधन की बैठकों का दौर इन दिनों सियासत के केंद्र में बना हुआ है। इसी बीच गठबंधन के भीतर सब कुछ ठीक न होने की खबरें तेजी से सतह पर आ रही हैं। ताजा मामला एक खास लंच पार्टी से जुड़ा है, जिसमें विपक्षी दलों के कई बड़े दिग्गज नेता शामिल हुए थे, लेकिन समाजवादी पार्टी के नेता नदारद दिखे। इस गैर-मौजूदगी के बाद दिल्ली के सियासी गलियारों में सुगबुगाहट शुरू हो गई कि क्या गठबंधन के भीतर अंदरूनी कलह और आपसी फूट एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है?
घटना के सामने आते ही समाजवादी पार्टी के अंदरखाने से तीखी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गईं। पार्टी से जुड़े करीबी सूत्रों ने यहां तक दावा कर दिया कि इस बड़े लंच आयोजन के लिए सपा नेतृत्व को औपचारिक रूप से बुलाया ही नहीं गया था। इस बयान के सामने आते ही मीडिया में कयासों का बाजार गर्म हो गया कि उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी और कांग्रेस या अन्य दलों के बीच तालमेल में कहीं कोई बड़ी कमी रह गई है। खासकर मध्य प्रदेश और राजस्थान विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार के बाद क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के रिश्तों को लेकर तमाम तरह की चर्चाएं चल रही थीं, जिन्हें इस घटना ने और हवा दे दी।
लंच में सपा सांसदों की गैर-मौजूदगी पर उठे सवाल
विपक्षी दलों की इस अहम बैठक के दौरान जब लंच का समय आया, तो समाजवादी पार्टी के किसी भी सांसद या बड़े नेता की मौजूदगी वहां दर्ज नहीं की गई। आमतौर पर ऐसे मौकों पर सभी सहयोगी दल एकजुटता दिखाने के लिए एक साथ कैमरे के सामने आते हैं, लेकिन इस बार तस्वीर बिल्कुल जुदा थी। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह सिर्फ एक खाने-पीने का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि गठबंधन की एकजुटता को जनता के सामने पेश करने का एक बड़ा मंच था। ऐसे महत्वपूर्ण मंच से एक बड़े राज्य की प्रमुख पार्टी का गायब रहना कई तरह के राजनीतिक संदेश दे रहा था, जिसे नजरअंदाज करना किसी भी दल के लिए मुमकिन नहीं था।
मीडिया रिपोर्ट्स और सूत्रों के हवालों से जब यह बात चारों तरफ फैल गई कि सपा को निमंत्रण नहीं मिला था, तो विपक्षी खेमे में खलबली मच गई। गठबंधन की साख पर उठ रहे सवालों के बीच डैमेज कंट्रोल की कोशिशें तुरंत शुरू कर दी गईं। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जोर पकड़ने लगी कि क्या आने वाले लोकसभा चुनावों से पहले सीटों के बंटवारे और नेतृत्व को लेकर सहयोगियों के बीच मनमुटाव शुरू हो चुका है। विरोधी दल यानी भारतीय जनता पार्टी भी इस मौके को भुनाने में पीछे नहीं रही और विपक्षी एकता के दावों पर खुलकर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए।
सपा प्रमुख अखिलेश यादव का आया आधिकारिक जवाब
बढ़ते विवाद और सियासी हंगामे के बीच आखिरकार समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने खुद सामने आकर इस पूरे मामले पर अपनी बात रखी। अखिलेश यादव ने मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए इस विवाद पर विराम लगाने की कोशिश की और स्पष्ट किया कि इसे तूल देने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि गठबंधन के भीतर छोटी-मोटी बातें होती रहती हैं और किसी एक घटना से पूरे मोर्चे की सेहत पर असर नहीं पड़ता है। अखिलेश यादव के इस संतुलित बयान के बाद पार्टी के भीतर और बाहर चल रही चर्चाओं को कुछ हद तक ठंडा करने का प्रयास किया गया है।
सूत्रों का यह भी कहना है कि आने वाले दिनों में सीट शेयरिंग के फार्मूले को लेकर सभी सहयोगी दल एक बार फिर आमने-सामने बैठकर बात करेंगे। कांग्रेस के निराशाजनक चुनावी प्रदर्शन के बाद अब क्षेत्रीय दल अपनी शर्तों पर मोलभाव करने के मूड में नजर आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की स्थिति बेहद मजबूत है और अखिलेश यादव राज्य में विपक्षी गठबंधन का मुख्य चेहरा हैं। ऐसे में उनकी नाराजगी या अनदेखी करना किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए राजनीतिक रूप से महंगा साबित हो सकता है, जिसे अब कांग्रेस और अन्य घटक दल भी अच्छी तरह समझ रहे हैं।
आगे की चुनावी रणनीति पर टिकी सबकी नजरें
इस पूरे घटनाक्रम के बाद भले ही अखिलेश यादव ने बयान देकर मामले को संभालने की कोशिश की हो, लेकिन अंदरखाने चल रही सुगबुगाहट अभी पूरी तरह थमी नहीं है। लोकसभा चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं और हर दल अपनी जमीन मजबूत करने की जुगत में लगा हुआ है। 'इंडिया' गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती आपसी मतभेदों को भुलाकर एक साझा और ठोस रणनीति तैयार करने की है। जब तक सीटों का बंटवारा और समन्वय का फॉर्मूला तय नहीं होता, तब तक ऐसे छोटे-मोटे विवाद राजनीति के पन्नों पर सुर्खियां बनते रहेंगे।
द फ्रीलान्स की जमीनी पड़ताल यह बताती है कि क्षेत्रीय दलों की अपनी राजनीतिक मजबूरियां और महत्वाकांक्षाएं हैं। उत्तर प्रदेश जैसे सबसे बड़े सूबे में बिना समाजवादी पार्टी के तालमेल के कोई भी समीकरण जमीन पर सफल होना असंभव सा है। आने वाले हफ्तों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि गठबंधन की अगली बैठकों में इन गिले-शिकवे को कैसे दूर किया जाता है और क्या सभी दल मिलकर एक मजबूत विकल्प पेश करने में कामयाब हो पाते हैं या नहीं।




