नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर इन दिनों राजनीतिक हलचल काफी तेज हो गई है। नीट पेपर लीक मामले और लगातार सामने आ रही परीक्षा गड़बड़ियों के खिलाफ युवाओं का गुस्सा सड़कों पर साफ दिखाई दे रहा है। इसी कड़ी में कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के बैनर तले युवाओं और छात्रों ने जंतर-मंतर पर लगातार छह हफ्तों तक धरना प्रदर्शन किया। यह पूरा आंदोलन शिक्षा व्यवस्था में सुधार और जिम्मेदार मंत्रियों के इस्तीफे की मांग को लेकर आयोजित किया गया था।
धरने का नेतृत्व कर रहे अभिजीत ने मीडिया और प्रशासन के सामने अपनी बातें स्पष्ट रूप से रखीं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अगले पांच दिनों के भीतर देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफा नहीं देते हैं, तो इस आंदोलन को और अधिक बड़े स्तर पर पूरे देश में फैलाया जाएगा। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि देश के लाखों युवाओं का भविष्य पेपर लीक जैसी घटनाओं की वजह से अधर में लटक गया है। सरकार को इस मामले में गंभीर कदम उठाने ही होंगे और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करनी होगी।
जंतर-मंतर पर 36 दिनों के लंबे धरने की पूरी कहानी
जंतर-मंतर पर पिछले 36 दिनों से चल रहा यह प्रदर्शन अब समाप्त हो गया है, लेकिन इसके पीछे की वजहों ने देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। पिछले तीन दशकों से भी ज्यादा समय से जंतर-मंतर को देश भर के आंदोलनों, धरना-प्रदर्शनों और अपनी बात सरकार तक पहुंचाने का सबसे प्रमुख केंद्र माना जाता रहा है। यहां तक कि कई सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों ने अपने अधिकारों के लिए महीनों यहां डेरा डाला है। लेकिन अब प्रशासनिक स्तर पर इस बात पर मंथन शुरू हो गया है कि क्या राजधानी के इस ऐतिहासिक इलाके को अब प्रदर्शन स्थल के रूप में रखना उचित है या नहीं।
पिछले कुछ हफ्तों से लगातार हो रहे प्रदर्शनों के कारण स्थानीय ट्रैफिक और आम लोगों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। इसी वजह से प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों के बीच जंतर-मंतर के स्वरूप में बदलाव को लेकर विचार-विमर्श चल रहा है। पिछले 33 वर्षों में यहां कई बड़े ऐतिहासिक आंदोलन हुए हैं, जिन्होंने देश की राजनीति की दिशा और दशा दोनों बदल दी हैं। लेकिन अब बढ़ते शहरीकरण और सुरक्षा के कारणों से इस नियम में बदलाव के कयास लगाए जा रहे हैं ताकि शहर की व्यवस्था को सुचारू रखा जा सके।
नीट पेपर लीक और युवाओं का बढ़ता रोष
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर हुआ यह प्रदर्शन सिर्फ एक राजनीतिक विरोध नहीं था, बल्कि यह देश के आम छात्र की चीख थी। नीट जैसी बड़ी राष्ट्रीय परीक्षाओं में लगातार हो रही धांधली और पेपर लीक के मामलों ने शिक्षा तंत्र की पोल खोल दी है। मेहनत करने वाले छात्र जब खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं, तो उनका गुस्सा सड़कों पर उतरना स्वाभाविक हो जाता है। जंतर-मंतर की इन सड़कों पर पिछले कई हफ्तों से गूंज रहे नारों ने सरकार के कानों तक यह संदेश साफ पहुंचा दिया है कि युवा अब चुप बैठने वाले नहीं हैं।
जमीन पर उतरी इस 'कॉकरोच जनता पार्टी' के आंदोलन ने भले ही अभी के लिए अपना धरना समाप्त कर दिया हो, लेकिन उन्होंने सरकार को पांच दिन का कड़ा अल्टीमेटम दिया है। यदि तय समय सीमा के भीतर शिक्षा मंत्रालय की तरफ से कोई ठोस कदम या संतोषजनक जवाब नहीं आता है, तो आंदोलनकारी फिर से कड़ा रुख अपना सकते हैं। पुलिस और स्थानीय प्रशासन भी पूरी स्थिति पर कड़ी नजर बनाए हुए है ताकि किसी भी तरह की कानून-व्यवस्था की समस्या से निपटा जा सके।
भविष्य की नीतियां और राजधानी में प्रदर्शनों का बदलता स्वरूप
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल से यह बात साफ हो जाती है कि जंतर-मंतर जैसे पारंपरिक प्रदर्शन स्थलों को लेकर आने वाले दिनों में कड़े नीतिगत फैसले लिए जा सकते हैं। एक तरफ जहां छात्र अपने भविष्य के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ने को तैयार बैठे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक अधिकारी व्यवस्था बनाए रखने के लिए नए नियमों का खाका तैयार कर रहे हैं। आने वाले पांच दिन इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के लिहाज से बेहद अहम रहने वाले हैं, जहां देश की निगाहें शिक्षा मंत्रालय के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।





