बेंगलुरु से हमारे विशेष संवाददादा की रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक की राजनीति में इन दिनों उपचुनाव के दौरान हुई उठापटक को लेकर घमासान मचा हुआ है। राज्य में हाल ही में संपन्न हुए उपचुनावों में पार्टी के भीतर ही भीतर भितरघात के आरोप लगने लगे हैं। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच मचे इस घमासान से राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। पार्टी के भीतर की यह खींचतान अब खुलकर मीडिया के सामने आने लगी है जिससे सरकार और संगठन दोनों की मुश्किलें बढ़ रही हैं।
इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब उपचुनाव के नतीजों और प्रचार के दौरान पार्टी विरोधी गतिविधियों की शिकायतें हाईकमान तक पहुंचीं। कांग्रेस के भीतर कुछ नेताओं ने बाकायदा इसकी जांच की मांग की और अनुशासनात्मक कार्रवाई की बात कही। इसमें सतीश जारकीहोली और उनके सहयोगियों की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गईं। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि चुनाव के समय आपसी तालमेल की कमी साफ दिखाई दे रही थी जिसका नुकसान पार्टी उम्मीदवारों को उठाना पड़ा।
उपचुनाव में भितरघात और पार्टी के भीतर घमासान
विवाद के तूल पकड़ने के बाद उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने इस पूरे मामले पर अपनी चुप्पी तोड़ी है और तीखी प्रतिक्रिया दी है। डीके शिवकुमार ने मीडिया के सामने स्पष्ट किया कि उन्हें इस मामले में बेवजह निशाना बनाया जा रहा है और गलत तरीके से जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि उन्होंने जो भी कदम उठाए या फैसले लिए, वे पूरी तरह से पार्टी के उच्च नेतृत्व के निर्देश पर थे। उनके इस बयान के बाद राज्य की राजनीति में एक नया मोड़ आ गया है।
कांग्रेस पार्टी के भीतर परिवारवाद और क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई भी इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक बड़ी वजह बताई जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाई-भतीजेवाद और टिकट बंटवारे को लेकर नेताओं के बीच जो असंतोष था, वह उपचुनाव के नतीजों के बाद बाहर आ रहा है। विभिन्न स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में भी इस बात के संकेत मिले हैं कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और आने वाले दिनों में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं।
डीके शिवकुमार का पलटवार और पार्टी निर्देश की बात
सतीश जारकीहोली और अन्य नेताओं का पक्ष भी इस पूरे मामले में बेहद अहम माना जा रहा है। जमीनी स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच इस खींचतान को लेकर गहरी निराशा है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस तरह की अंदरूनी कलह से आगामी चुनावों में पार्टी की छवि को बड़ा नुकसान पहुंच सकता है। हालांकि, प्रदेश नेतृत्व डैमेज कंट्रोल में जुट गया है और सभी असंतुष्ट नेताओं को मनाने की कोशिश की जा रही है ताकि संगठन में एकता बनी रहे।
राज्य सरकार और पार्टी संगठन के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती सभी गुटों को साधकर चलने की है। डीके शिवकुमार के बयान के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी आलाकमान इस मामले में क्या रुख अपनाता है। क्या बागी तेवर दिखाने वाले नेताओं पर कोई सख्त कार्रवाई होगी या फिर मामले को आपसी समझौते से दबा दिया जाएगा। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है और जैसे ही कोई नया अपडेट आएगा, पाठकों तक सबसे पहले पहुंचाया जाएगा।
संगठन की एकता पर मंडराता संकट और आगे की रणनीति
स्थानीय निकाय चुनावों और आगामी राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से यह विवाद कांग्रेस पार्टी के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। विपक्षी दल इस स्थिति का पूरा फायदा उठाने की फिराक में हैं और लगातार सरकार पर हमलावर हैं। जनता के बीच भी इस बात की चर्चा है कि यदि सत्तारूढ़ दल के नेता आपस में ही उलझेंगे, तो जनता के विकास कार्य कैसे आगे बढ़ेंगे। आने वाले कुछ दिन कर्नाटक की राजनीति के लिए बेहद उथल-पुथल भरे साबित हो सकते हैं और सभी की निगाहें दिल्ली दरबार पर टिकी हैं।








