नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी दिल्ली के राजनीतिक गलियारों से लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार के छात्र चौपालों तक इन दिनों एक ही नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है। यह नाम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी जेएनयू की शोध छात्रा नेहा बोरा का है। कुछ समय पहले जंतर-मंतर पर लगातार तेईस दिनों तक चली लंबी भूख हड़ताल के बाद नेहा अचानक राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गईं। आम छात्रों के हक, अधिकार और देश भर में फैल रही बेरोजगारी के खिलाफ उनकी आवाज अब एक बड़ा आंदोलन बनती जा रही है। 'द फ्रीलान्स' की टीम ने जब इस पूरे मामले की जमीनी पड़ताल की, तो पता चला कि कैसे एक साधारण छात्र नेता आज लाखों युवाओं की उम्मीद बन चुकी है।
जेएनयू के गलियारों से निकलकर सड़कों पर संघर्ष करने वाली नेहा बोरा इन दिनों अपनी पढ़ाई के साथ-साथ छात्र राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर पूरी तरह सक्रिय हैं। विश्वविद्यालय परिसरों में अकादमिक पढ़ाई के बीच उनका यह सफर काफी संघर्षपूर्ण रहा है। उनके करीबियों का कहना है कि वह जेएनयू में उच्च शिक्षा हासिल कर रही हैं और छात्रों के बुनियादी मुद्दों को हमेशा सबसे आगे रहकर उठाती रही हैं। पढ़ाई के साथ-साथ देश की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर उनकी गहरी पकड़ है। जब भी देश के किसी कोने में छात्रों पर कोई संकट आता है, वह अपनी आवाज बुलंद करने से पीछे नहीं हटती हैं।
अयोध्या और आजमगढ़ में गूंजी शिक्षा और रोजगार की मांग
उत्तर प्रदेश के दौरे पर निकलीं नेहा बोरा ने हाल ही में धार्मिक नगरी अयोध्या और पूर्वांचल के अहम केंद्र आजमगढ़ का दौरा किया। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन यानी आइसा की तरफ से निकाली गई इस यात्रा के दौरान उन्होंने सरकार पर जमकर निशाना साधा। अयोध्या में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने साफ कहा कि देश में लगातार बढ़ रहा भ्रष्टाचार और खराब होती शिक्षा व्यवस्था आम छात्रों का भविष्य बर्बाद कर रही है। आजमगढ़ में भी उन्होंने एक बड़ी जनसभा को संबोधित किया और दो टूक कहा कि छात्रों के शिक्षा, रोजगार और न्याय की यह लड़ाई तब तक नहीं रुकेगी जब तक सिस्टम में सुधार नहीं होता। उनके इन दौरों में हजारों की संख्या में युवा और छात्र जुड़ते नजर आए।
पूर्वांचल के बाद नेहा बोरा का कारवां बिहार की राजधानी पटना भी पहुंचा। पटना दौरे के दौरान उन्होंने स्थानीय छात्रों और युवा संगठनों के साथ लंबी बैठकें कीं। इस दौरान उन्होंने बिहार में आए दिन सामने आने वाले पेपर लीक मामलों और नौकरी की मांग कर रहे युवाओं पर हो रही पुलिस कार्रवाई की कड़ी निंदा की। उन्होंने राज्य के शिक्षा मंत्री और प्रशासनिक अधिकारियों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि युवाओं का सब्र अब जवाब दे चुका है। पटना की सड़कों पर छात्रों के बीच उनकी यह सक्रियता यह बताने के लिए काफी है कि आने वाले दिनों में यह छात्र आंदोलन और अधिक तेज होने वाला है।
जंतर-मंतर की वह तेईस दिन लंबी भूख हड़ताल
नेहा बोरा के संघर्ष की सबसे बड़ी नींव जंतर-मंतर पर पड़ी थी, जहां उन्होंने अपनी मांगों को लेकर लगातार तेईस दिनों तक अन्न का एक भी दाना नहीं खाया था। उनकी इस लंबी भूख हड़ताल ने देश भर के मीडिया और विपक्षी दलों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था। हालांकि उनकी इस जिद और हौसले के आगे प्रशासन को भी झुकना पड़ा था, लेकिन छात्रों के हक की यह लड़ाई अभी थमी नहीं है। उनका साफ कहना है कि जब तक देश के हर युवा को पक्की नौकरी और मुफ्त व बेहतर शिक्षा नहीं मिल जाती, तब तक उनका यह संघर्ष विभिन्न विश्वविद्यालयों और सड़कों पर जारी रहेगा।
जमीनी स्तर पर हमारी पड़ताल यह भी बताती है कि छोटे शहरों और गांवों के युवा अब इन मुद्दों पर खुलकर बोलने लगे हैं। नेहा बोरा जैसे युवा चेहरों का आगे आना इस बात का संकेत है कि देश की युवा पीढ़ी अपनी शिक्षा और रोजगार को लेकर अब गंभीर हो चुकी है। राजनीति और समाज के जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में छात्र आंदोलन देश की मुख्यधारा की राजनीति को बड़ी दिशा दे सकते हैं। 'द फ्रीलान्स' इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा और हर एक ताजा अपडेट आप तक पहुंचाता रहेगा।
छात्र राजनीति का बदलता हुआ चेहरा और भविष्य की राह
आज के समय में जब छात्र राजनीति अक्सर दिशाहीन होती दिखती है, तब नेहा बोरा जैसे चेहरे एक नई उम्मीद जगाते हैं। उनकी भाषा सीधी, स्पष्ट और आम युवाओं से जुड़ी होती है, यही वजह है कि वे आसानी से लोगों के दिलों में उतर जाती हैं। विश्वविद्यालय परिसरों से शुरू हुई यह चिंगारी अब देश के कई राज्यों में शोला बनकर फैल रही है। 'द फ्रीलान्स' की टीम ने पाया कि आने वाले दिनों में यह आंदोलन और अधिक व्यापक रूप ले सकता है, क्योंकि देश का युवा वर्ग अब बदलाव चाहता है।






