नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के राजनीतिक गलियारों से लेकर आर्थिक बाजारों तक आजकल एक खास चर्चा बहुत जोर पकड़ रही है। यह चर्चा है ओलिगार्क यानी उन गिने-चुने खरबपतियों की जो देश की कुल संपत्ति और संसाधनों के बड़े हिस्से पर कब्जा जमाए बैठे हैं। द फ्रीलान्स की टीम ने जब इस ट्रेंड की गहराई से पड़ताल की तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। पिछले कुछ दशकों में ऐसा देखा गया है कि धन और सत्ता का यह मेल लोकतंत्र की नींव को अंदर से कमजोर कर रहा है। अलीगढ़ में प्रशासनिक कार्रवाई से लेकर बिहार के चुनावी रण तक हर जगह किसी न किसी रूप में इस व्यवस्था का परछाई साफ नजर आती है। सवाल यह है कि क्या आम आदमी के वोट की ताकत इन चंद अमीरों के वित्तीय साम्राज्य के सामने कमजोर पड़ती जा रही है?
देश के विभिन्न राज्यों से मिल रही खबरों पर गौर करें तो यह साफ हो जाता है कि सत्ता के समीकरण किस तरह बदल रहे हैं। एक तरफ जहां अलीगढ़ में आम कर्मचारियों और छोटे मामलों पर तुरंत कानूनी शिकंजा कसा जाता है, वहीं बड़े औद्योगिक और वित्तीय घराने नियमों के दायरे से अक्सर बाहर नजर आते हैं। बिहार में होने वाले आगामी एमएलसी चुनावों और त्योहारों के सीजन में ट्रेनों की बढ़ती भीड़ के बीच भी यह आर्थिक असमानता साफ झलकती है। आम जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है जबकि बड़े व्यापारिक समूहों को नीतिगत फैसलों में सीधी प्राथमिकता मिलती है। यह वह खाई है जो लगातार चौड़ी होती जा रही है और इसे पाटने के लिए किसी बड़े प्रशासनिक और सामाजिक सुधार की सख्त जरूरत है।
नीतिगत फैसलों पर कैसे हावी होते हैं कॉरपोरेट घराने
जब हम ओलिगार्क व्यवस्था की बात करते हैं तो सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि ये लोग सरकार के फैसलों को कैसे प्रभावित करते हैं। जमीनी स्तर पर पड़ताल करने पर पता चलता है कि बड़े उद्योगपति अपनी पूंजी के दम पर बड़े नीतिगत बदलाव करवाने की ताकत रखते हैं। चाहे वह करों में छूट का मामला हो या फिर सरकारी संपत्तियों के निजीकरण का दौर, हर जगह चंद खास लोगों को ही सबसे बड़ा फायदा मिलता है। आम व्यापारी या छोटा उद्यमी इन बड़े समूहों के साथ प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाता है। नतीजा यह होता है कि बाजार में चुनिंदा लोगों का एकाधिकार बन जाता है और कीमतें उनकी मर्जी से तय होती हैं। आम उपभोक्ता महंगाई की मार झेलने को मजबूर होता है और उसकी सुनने वाला कोई नहीं होता।
इस पूरे खेल में सबसे बड़ा नुकसान पारदर्शिता और जवाबदेही का होता है। जब चंद लोग देश की अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने लगते हैं तो लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों को गहरा धक्का लगता है। बिहार बोर्ड की परीक्षाओं से जुड़े पुराने दस्तावेजों या छात्रों की शिक्षा से जुड़ी व्यवस्थाओं को देखें तो वहां भी संसाधनों की भारी कमी दिखाई देती है। इसके विपरीत, वीआईपी कल्चर और बड़े कॉरपोरेट इवेंट्स पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है। यह विसंगति ही आज के समय की सबसे बड़ी सच्चाई है जिसे छिपाया नहीं जा सकता। पत्रकारिता का धर्म यही है कि वह इस पर्दे को हटाकर सच को जनता के सामने रखे ताकि लोग खुद समझ सकें कि उनके अधिकारों का हनन कैसे हो रहा है।
आम नागरिक के जीवन पर इस व्यवस्था की सीधी मार
आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी पर इन ओलिगार्क ताकतों का असर बहुत गहरा और सीधा है। जब देश के सारे संसाधन और बड़े उद्योग कुछ ही हाथों में सिमट जाते हैं तो रोजगार के अवसर भी कम होने लगते हैं। नौकरियां सिकुड़ जाती हैं और महंगाई आसमान छूने लगती है। अलीगढ़ में तीन तलाक और हलाला जैसे मामलों में भले ही पुलिस सख्त कार्रवाई कर रही हो, लेकिन सामाजिक असमानता की जड़ें बहुत गहरी हैं। जब तक समाज में आर्थिक न्याय नहीं मिलेगा तब तक इस तरह की कुप्रथाओं और अपराधों से पूरी तरह निजात पाना मुश्किल होगा। आम नागरिक हर रोज सुबह उठकर अपने परिवार का पेट पालने के लिए संघर्ष करता है, जबकि दूसरी तरफ विलासिता का एक ऐसा संसार है जिस पर इन शक्तिशाली लोगों का पूर्ण नियंत्रण है।
द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन का मकसद किसी की छवि खराब करना नहीं बल्कि समाज के सामने आईने जैसी सच्चाई रखना है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प और चिंताजनक होगा कि सरकार इन आर्थिक ताकतों पर लगाम लगाने के लिए क्या कदम उठाती है। क्या नियम कायदे सिर्फ कमजोर वर्ग के लिए बने हैं या फिर कानून का शिकंजा इन ताकतवर लोगों पर भी कसा जाएगा? जनता अब जागरूक हो रही है और वह अपने अधिकारों के लिए सवाल पूछने लगी है। हमारी यह पड़ताल यहीं नहीं रुकेगी और हम आगे भी इस तरह के हर बड़े ट्रेंड की सच्चाई जनता के सामने लाते रहेंगे जब तक व्यवस्था में पूरी पारदर्शिता नहीं आ जाती।



