मिडिल ईस्ट में हालात हर गुजरते दिन के साथ बहुत खतरनाक होते जा रहे हैं। सऊदी अरब की राजधानी रियाद से एक बहुत बड़ी खबर सामने आई है। यमन के हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों से सऊदी अरब का गुस्सा अब फूट पड़ा है। इस बार सऊदी सरकार ने किसी और देश पर नहीं बल्कि सीधे तौर पर चीन पर बड़ा हमला बोला है। सऊदी मीडिया और कूटनीतिक सूत्रों के हवाले से यह बात सामने आई है कि बीजिंग से साफ कहा गया है कि वह तटस्थ होने का नाटक अब पूरी तरह बंद कर दे।
यह विवाद तब और गहरा गया जब मक्का के बाद अब मदीना पर भी मिसाइल हमले की खबरें सामने आईं। हालांकि, यमन के हूती विद्रोहियों ने इन हमलों की जिम्मेदारी लेने से इंकार कर दिया है। इसके बावजूद मध्य पूर्व के देशों का मानना है कि इन हमलों के पीछे परोक्ष रूप से बाहरी ताकतों और ईरान समर्थित समूहों का हाथ है। लाल सागर में जहाजों पर हो रहे इन हमलों ने पूरी दुनिया की नींद उड़ा दी है। भारत आने वाले तेल टैंकर भी इन खतरों के बीच से गुजरने को मजबूर हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी तनाव पैदा हो गया है।
सऊदी अरब ने बीजिंग को भेजे तीखे संदेश
सऊदी अरब ने कूटनीतिक चैनलों के जरिए चीन को तीन बहुत कड़े संदेश भेजे हैं। पहला संदेश यह है कि आर्थिक समझौतों से परे अब सुरक्षा के मोर्चे पर भी चीन को अपनी स्थिति साफ करनी होगी। दूसरा संदेश यह है कि मध्य पूर्व में शांति के लिए बीजिंग केवल कूटनीतिक बयानबाजी करने के बजाय जमीन पर असर दिखाने वाले कदम उठाए। तीसरा और सबसे कड़ा संदेश यह है कि हूती विद्रोहियों को परोक्ष समर्थन देने वाले देशों पर लगाम कसने के लिए चीन अपनी वैश्विक ताकत का इस्तेमाल करे। सऊदी अरब का यह रुख चीन के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
दूसरी ओर, वैश्विक कूटनीति के मोर्चे पर कई बड़े बदलाव भी देखने को मिल रहे हैं। लेबनान में शांति स्थापित करने की कोशिशें नाकाम होने के बाद संयुक्त राष्ट्र के शांतिरक्षक अब वापस लौट रहे हैं। इसमें भारत के 641 सैनिक भी शामिल हैं जिनकी सुरक्षित वतन वापसी की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। युद्ध के इन सायों के बीच आम जनता और नाविकों की जान पर लगातार खतरा मंडरा रहा है। होर्मुज स्ट्रेट के पास से गुजरने वाले जहाज अब अपनी पहचान छिपाकर या तकनीक की मदद से 'अदृश्य' होकर मौत के इस गलियारे को पार करने को मजबूर हैं।
लाल सागर और तेल मार्गों पर मंडराता गंभीर संकट
सऊदी अरब का यह सीधा हमला इस बात का सबूत है कि खाड़ी देश अब कूटनीतिक नरमी दिखाने के मूड में नहीं हैं। चीन पिछले कुछ सालों से मध्य मध्य पूर्व में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। उसने ईरान और सऊदी अरब के बीच समझौता कराने में भी मध्यस्थता की थी। लेकिन मौजूदा हालात में जब हूती विद्रोही लगातार तेल अड्डों और समुद्री मार्गों को निशाना बना रहे हैं, तब चीन की चुप्पी सऊदी अरब को नागवार गुजर रही है। रियाद ने बीजिंग को साफ कर दिया है कि व्यापारिक हित अपनी जगह हैं, लेकिन क्षेत्रीय सुरक्षा पर अब दोहरे मापदंड नहीं चलेंगे।
आने वाले दिनों में इस भू-राजनीतिक तनाव का असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। भारत जैसे देशों के लिए यह चिंता का विषय है क्योंकि उनकी ऊर्जा जरूरतें इसी रास्ते से पूरी होती हैं। तेल टैंकरों का सुरक्षित निकलना हर देश की अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है। सऊदी अरब और चीन के बीच यह तनातनी आने वाले समय में नए समीकरण तय करेगी। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार अपनी नजर बनाए हुए है और जमीनी अपडेट आप तक पहुंचाती रहेगी।






