बिहार की सियासत इन दिनों एक बार फिर बहुत तेजी से बदल रही है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा यानी रालोमो के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा लगातार ऐसे बयान दे रहे हैं जिससे राज्य का सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। हाल ही में उन्होंने कांग्रेस सांसद राहुल गांधी पर बड़ा हमला बोला है। कुशवाहा ने कहा कि अगर राहुल गांधी का बस चलता तो वे देश की सरकार को बहुत पहले गिरा देते। उन्होंने यह भी कहा कि राहुल गांधी के बयानों और तौर-तरीकों का देश की राजनीति पर कोई अच्छा असर नहीं पड़ रहा है। कुशवाहा के इस तीखे बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर बहुत तेज हो गया है और हर कोई इसके सियासी मायने निकालने में जुटा है।
दूसरी तरफ उपेंद्र कुशवाहा ने एनडीए और महागठबंधन दोनों पर ही बड़ा जुबानी हमला बोला है। उन्होंने एक बयान में कहा कि आज के समय में चाहे एनडीए हो या फिर महागठबंधन, दोनों तरफ के राजनीतिक माहौल में नशा घुल चुका है। उनके इस बयान के बाद सियासी खेमों में खलबली मच गई है। लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर कुशवाहा इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कुशवाहा अपने बयानों के जरिए अपनी पार्टी की प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। बिहार में विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं और ऐसे में हर छोटा और बड़ा नेता अपनी जमीन मजबूत करने के लिए नए दांव चल रहा है।
पार्टी के भीतर बढ़ती नाराजगी और माधव आनंद की चर्चा
उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोमो के भीतर भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। पार्टी के भीतर चल रही उठापटक अब खुलकर बाहर आने लगी है। सियासी गलियारों में यह चर्चा बहुत जोर पकड़ चुकी है कि क्या पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव माधव आनंद ममता बनर्जी के खास नेता ऋतब्रत की तरह कदम उठाने जा रहे हैं। पार्टी के अंदरखाने मचे इस घमासान ने कुशवाहा की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। एक समय जिन नेताओं पर कुशवाहा सबसे ज्यादा भरोसा करते थे, वे ही अब पार्टी से दूरी बनाते दिख रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर समय रहते पार्टी के भीतर चल रहे असंतोष को नहीं दबाया गया, तो रालोमो को आने वाले दिनों में बहुत बड़ा राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
पार्टी में मचे इस घमासान के बीच उपेंद्र कुशवाहा को 'बेलडमरू' कहे जाने पर भी सियासत खूब गरमाई हुई है। इस अपमानजनक टिप्पणी के बाद से ही रालोमो के कार्यकर्ता काफी गुस्से में हैं। हालांकि, जब इस मामले पर भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के नेताओं से सवाल पूछा गया, तो उन्होंने तुरंत इस विवाद से अपना पल्ला झाड़ लिया। एनडीए के सहयोगियों का कहना है कि यह बयान किसका है और क्यों दिया गया है, इससे उनका कोई लेना-देना नहीं है। सहयोगियों के इस तरह दूरी बनाने से साफ जाहिर होता है कि उपेंद्र कुशवाहा इस समय सियासी मोर्चे पर अकेले पड़ते जा रहे हैं।
बिहार चुनाव से पहले क्षेत्रीय दलों की बढ़ती बेचैनी
बिहार में होने वाले अगले बड़े चुनावों को ध्यान में रखते हुए सभी छोटे-बड़े दल अपनी सियासी जमीन तलाशने में जुटे हैं। उपेंद्र कुशवाहा कभी एनडीए के साथ मजबूती से खड़े दिखते हैं तो कभी उनके तेवर बगावत वाले हो जाते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि कुशवाहा की यह रणनीति उन्हें कई बार असमंजस में डाल देती है। एक तरफ वे एनडीए का हिस्सा हैं, तो दूसरी तरफ सरकार और विपक्ष दोनों पर खुलकर सवाल उठा रहे हैं। उनके इन बयानों से कार्यकर्ताओं के मन में भी असमंजस की स्थिति पैदा हो रही है कि आखिर पार्टी की असल राजनीतिक लाइन क्या है।
जमीनी स्तर पर अगर बात की जाए तो आम जनता इन सियासी ड्रामेबाजी से अब ऊब चुकी है। लोगों का मानना है कि नेताओं को रोजगार, शिक्षा और विकास के मुद्दों पर बात करनी चाहिए, न कि सिर्फ बयानबाजी में वक्त गंवाना चाहिए। उपेंद्र कुशवाहा के इन ताजा बयानों से भले ही मीडिया की सुर्खियां बटोरने में मदद मिल रही हो, लेकिन जमीनी वोट बैंक पर इसका कितना असर होगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल पार्टी के भीतर टूट का खतरा और सहयोगियों की बेरुखी कुशवाहा के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल और निष्कर्ष
हमारी ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि उपेंद्र कुशवाहा इस समय अपने राजनीतिक जीवन के सबसे संवेदनशील दौर से गुजर रहे हैं। एक तरफ उन्हें अपने बयानों से मचे सियासी बवाल को संभालना है, तो दूसरी तरफ पार्टी के भीतर बगावत के सुरों को शांत करना है। एनडीए के भीतर उनकी स्थिति अब पहले जैसी मजबूत नजर नहीं आ रही है। अगर उन्होंने जल्द ही अपने नेताओं को एकजुट नहीं किया और बयानों पर लगाम नहीं लगाई, तो रालोमो का भविष्य खतरे में पड़ सकता है। 'द फ्रीलान्स' इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार पैनी नजर बनाए रखेगा और आगे भी आपको पल-पल की सटीक सच्चाई से अवगत कराता रहेगा।




