नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — अमेरिका से भारतीय टेक पेशेवरों के लिए एक बहुत बड़ी और बुरी खबर सामने आई है। ट्रंप प्रशासन ने देश की कई नामी कंपनियों के ग्रीन कार्ड आवेदनों पर बड़ा एक्शन लिया है। माइक्रोसॉफ्ट, इंफोसिस, विप्रो और टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज यानी टीसीएस समेत करीब आठ बड़ी कंपनियों के पर्म लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम को सस्पेंड कर दिया गया है। इस अचानक आए फैसले से उन लाखों भारतीय इंजीनियरों और कर्मचारियों पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं जो सालों से अमेरिका में ग्रीन कार्ड मिलने का इंतजार कर रहे थे। द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल के मुताबिक इस कदम से अमेरिकी टेक बाजार में हड़कंप मच गया है।
अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि ये बड़ी कंपनियां स्थानीय अमेरिकी नागरिकों की नौकरियां छीन रही हैं। कंपनियों पर यह भी आरोप है कि वे कम वेतन पर बाहरी देशों से आए विदेशी पेशेवरों को नौकरी दे रही हैं। इस वजह से अमेरिकी युवाओं को रोजगार के सही अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। इसी गंभीर आरोप के तहत सरकार ने पर्म प्रोग्राम के तहत इन कंपनियों की सभी नई प्रक्रियाओं पर पूरी तरह रोक लगा दी है। जब तक मामले की जांच पूरी नहीं होती, तब तक किसी भी नए आवेदन को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। इससे कंपनियों के साथ-साथ उनके यहां काम करने वाले भारतीय कर्मचारियों का भविष्य भी अधर में लटक गया है।
पर्म लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम क्यों बना है बड़ी जंग का मैदान?
अमेरिका में पर्म प्रोग्राम वह कानूनी प्रक्रिया है जिसके जरिए कोई भी कंपनी अपने विदेशी कर्मचारियों को परमानेंट रेजिडेंट यानी ग्रीन कार्ड दिलाने की प्रक्रिया शुरू करती है। इसके बिना कोई भी विदेशी कर्मचारी अमेरिका में स्थायी रूप से रहने का कानूनी अधिकार नहीं पा सकता है। अब इस प्रोग्राम के ही सस्पेंड होने से वीजा धारकों की मुश्किलें कई गुना बढ़ गई हैं। जिन लोगों के आवेदन पहले से ही लंबी कतार में फंसे थे, उनका इंतजार अब और भी ज्यादा लंबा हो जाएगा। जानकारों का मानना है कि इस नीतिगत बदलाव से सिलिकॉन वैली से लेकर तमाम बड़े तकनीकी hubs तक में काम करने वाले प्रवासी भारतीय सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।
भारतीय आईटी सेक्टर के जानकारों का कहना है कि माइक्रोसॉफ्ट और इंफोसिस जैसी कंपनियों पर इस तरह का प्रशासनिक शिकंजा कसना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। अमेरिका में स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ाने के लिए ट्रंप प्रशासन लगातार कड़े फैसले ले रहा है। इसका सीधा असर भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियरों की उन उम्मीदों पर पड़ा है जो अमेरिका को अपनी कर्मभूमि बनाकर वहां स्थायी रूप से बसना चाहते थे। कंपनियों की तरफ से अभी तक इस मामले पर कोई बड़ा आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन अंदरखाने बैठकों का दौर तेज हो गया है। कॉर्पोरेट वकील इस कानूनी पेंच को सुलझाने के नए रास्तों की तलाश में जुटे हैं ताकि पेंडिंग मामलों को जल्द से जल्द राहत मिल सके।
लाखों भारतीय पेशेवरों का ग्रीन कार्ड का सपना अब कितना दूर?
अमेरिका में पहले से ही ग्रीन कार्ड के बैकलॉग की समस्या बहुत ज्यादा गंभीर रही है। भारतीयों को वैध तरीके से ग्रीन कार्ड मिलने में दशकों का समय लग जाता है। अब इस नई रोक के बाद यह इंतजार और भी ज्यादा लंबा और अनिश्चित हो गया है। जिन आईटी प्रोफेशनल्स के वीजा की अवधि खत्म होने वाली है, वे अब अपने भविष्य को लेकर खासे चिंतित नजर आ रहे हैं। उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि पर्म प्रक्रिया लंबे समय तक बंद रही, तो वे अमेरिका में कानूनी रूप से कैसे टिक पाएंगे। परिवार के साथ रह रहे कर्मचारियों के सामने बच्चों की पढ़ाई और घर के खर्चों को लेकर भी बड़ा संकट खड़ा हो गया है।
द फ्रीलान्स की टीम ने जब अमेरिका और भारत के कुछ तकनीकी विशेषज्ञों से बात की, तो उन्होंने इसे भारतीय आईटी उद्योग के लिए एक बड़ा झटका करार दिया। उनका मानना है कि आने वाले दिनों में यदि यह रोक नहीं हटी, तो बड़ी कंपनियां भारत और अन्य देशों से टैलेंट हायर करने के अपने तरीकों में बड़ा बदलाव करने पर मजबूर हो जाएंगी। वे अमेरिका के बजाय अपने प्रोजेक्ट्स को दूसरे देशों या भारत के ऑफशोर सेंटर्स में शिफ्ट कर सकती हैं। कुल मिलाकर, अमेरिका का यह कड़ा फैसला केवल कंपनियों के लिए ही नहीं, बल्कि वहां की अर्थव्यवस्था और व्यक्तिगत स्तर पर काम करने वाले हर उस भारतीय इंजीनियर के लिए गहरी चिंता का विषय बन गया है जो अपने सुनहरे भविष्य का सपना लेकर महासागर पार गया था।
आगे की कानूनी चुनौतियां और कंपनियों का रुख
इस पूरे घटनाक्रम के बाद अमेरिकी अदालतों में कुछ ट्रेड यूनियनों और कॉर्पोरेट घरानों के बीच कानूनी लड़ाई छिड़ने की पूरी संभावना है। कंपनियां यह साबित करने की कोशिश करेंगी कि वे अमेरिकी श्रम कानूनों का पूरा पालन कर रही हैं और उनके यहां काम करने वाले विदेशी कर्मचारी देश की तकनीकी प्रगति के लिए बेहद जरूरी हैं। दूसरी तरफ, प्रशासन अपने सख्त रुख पर कायम है और वह अमेरिकी नागरिकों के हितों को सबसे ऊपर रखने की बात कह रहा है। आने वाले कुछ हफ्तों में यह साफ हो पाएगा कि इस रोक को पूरी तरह स्थायी बनाया जाता है या फिर कुछ शर्तों के साथ इसमें कोई ढील दी जाती है। तब तक भारत से अमेरिका गए लाखों तकनीकी कर्मचारियों की सांसें अटकी रहेंगी।












