अमेरिकी प्रशासन द्वारा पश्चिम एशिया के एक प्रमुख मुस्लिम देश के खिलाफ छेड़े गए रणनीतिक अभियान और होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण के दावों के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। वैश्विक पटल पर यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या इस सैन्य आक्रामकता से उस देश का नामोनिशां मिटाने चले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अपनी ही भद्द पिट गई है। इस पूरे घटनाक्रम और भू-राजनीतिक तनाव के बीच शुरुआती वित्तीय आकलन बताते हैं कि अमेरिका और उसके सहयोगियों को लगभग 31,943 करोड़ रुपये का करारा आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा है। इस नुकसान ने अमेरिकी नीतियों पर घरेलू स्तर पर भी सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
मामले की गहराई से पड़ताल करने पर यह बात सामने आती है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिकी नौसेना का सीधा नियंत्रण स्थापित करने के प्रयासों के कारण वैश्विक नौवहन और तेल आपूर्ति मार्ग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। ऊर्जा बाजारों में इस अनिश्चितता के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है, जिसका सीधा असर अमेरिकी खजाने और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। जानकारों का मानना है कि इस तरह के सैन्य हस्तक्षेप से भले ही राजनीतिक दबदबा दिखाने की कोशिश की गई हो, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर देश को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस कदम की आलोचना भी हो रही है क्योंकि इससे क्षेत्रीय स्थिरता को बड़ा झटका लगा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर नौसेना का नियंत्रण और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव
अमेरिकी नौसेना द्वारा होर्मुज के सामरिक जलमार्ग पर कब्जा जमाने की कार्रवाई के बाद से ही इस क्षेत्र में तनाव चरम पर पहुंच गया है। इस जलमार्ग से दुनिया का एक बड़ा हिस्सा तेल आपूर्ति के लिए गुजरता है, और यहां किसी भी प्रकार की रोक-टोक से पूरी दुनिया में ईंधन के दाम आसमान छूने लगते हैं। अमेरिकी प्रशासन ने अपनी सामरिक ताकत का प्रदर्शन करते हुए इस मार्ग पर नियंत्रण का दावा तो कर दिया, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम बेहद खतरनाक साबित हो रहे हैं। क्षेत्रीय देशों और स्थानीय ताकतों की तरफ से मिल रही कड़ी प्रतिक्रिया ने अमेरिकी रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है।
विश्लेषकों का यह भी कहना है कि इस पूरे विवाद के बीच नोबेल शांति पुरस्कार की दौड़ और राजनीतिक चर्चाओं को लेकर भी अमेरिकी खेमे में अलग ही सुगबुगाहट चल रही है। एक तरफ जहां ट्रंप प्रशासन अपनी सैन्य सफलताओं का ढिंढोरा पीट रहा है, वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में उन्हें मुंह की खानी पड़ रही है। अतीत में मारिया मचाडो से जुड़ी चर्चाओं के बाद अब ट्रंप की नजरें एक बार फिर बड़े वैश्विक सम्मानों पर टिकी हैं, लेकिन जमीन पर सुलगते सुलगते हालात उनके दावों की पोल खोल रहे हैं। सैन्य ताकत के बल पर कूटनीति जीतने का यह दांव अब अमेरिकी कूटनीति के लिए ही गले की फांस बनता जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का हस्तक्षेप और कच्चे तेल के भंडार का संकट
बढ़ते तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी यानी आईईए ने स्थिति को संभालने के लिए बड़ा कदम उठाया है। एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि यदि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कमी या कीमतें अनियंत्रित होती हैं, तो वे अपने रणनीतिक भंडारों से और अधिक तेल बाजार में जारी करने से पीछे नहीं हटेंगे। इस घोषणा का उद्देश्य तेल की बढ़ती कीमतों को थामना और औद्योगिक देशों की अर्थव्यवस्था को बचाना है। इसके बावजूद, जिस तरह से अमेरिकी फैसलों ने बाजार को अस्थिर किया है, उससे निवेशकों में डर का माहौल बना हुआ है।
दूसरी ओर, इसी क्षेत्र से जुड़ी मानवीय त्रासदियों की कहानियां भी लगातार सामने आ रही हैं, जो इन राजनीतिक और सैन्य संघर्षों की असल कीमत को दर्शाती हैं। हाल ही में सऊदी अरब की जेलों में बरसों की कैद के बाद एक भारतीय नागरिक नंदलाल का शव कफन में वापस लौटने की दुखद घटना ने हर संवेदनशील इंसान को झकझोर कर रख दिया है। इन तमाम घटनाओं के बीच आम नागरिकों की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं, जबकि बड़े देश अपनी राजनीतिक र रोटियां सेकने में लगे हुए हैं। द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से साफ है कि सत्ता के इन खेलों में अंततः नुकसान आम आदमी और कमजोर अर्थव्यवस्थाओं का ही होता है।



