अमेरिका ने ग्रीन कार्ड की चाह रखने वाले लाखों विदेशी नागरिकों और भारतीय तकनीकी पेशेवरों को एक बड़ा झटका दिया है। देश की बड़ी और जानी-मानी आईटी कंपनियां जैसे कि इंफोसिस, विप्रो और टीसीएस समेत आठ प्रमुख कंपनियों को स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम से अलग कर दिया गया है। इस नए और सख्त फैसले के बाद अमेरिका में काम कर रहे भारतीय कर्मचारियों के लिए परमानेंट रेजिडेंसी यानी ग्रीन कार्ड हासिल करना बेहद कठिन हो गया है।
यह पूरा मामला अमेरिकी आव्रजन और श्रम विभाग की कड़ी नीतियों से जुड़ा हुआ है। नियमों का पालन न करने या प्रक्रियाओं में कमियां पाए जाने के बाद इन कंपनियों पर यह बड़ी कार्रवाई की गई है। इस प्रोग्राम के जरिए अमेरिकी कंपनियां अपने विदेशी कर्मचारियों को स्थायी रूप से देश में रहने और काम करने का कानूनी अधिकार दिलाती थीं। अब इस सूची से बाहर होने के कारण इन कंपनियों के कर्मचारियों को भारी प्रशासनिक और कानूनी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।
भारतीय आईटी सेक्टर पर इसका सीधा असर
भारत की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर और तकनीकी सेवा देने वाली कंपनियों के लिए यह फैसला एक बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है। अमेरिका में हर साल हजारों भारतीय इंजीनियर एच-1बी वीजा पर काम करने जाते हैं और बाद में ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करते हैं। जब ये प्रमुख कंपनियां ही इस विशेष श्रम प्रमाणन प्रक्रिया से बाहर हो जाएंगी, तो वहां काम कर रहे कर्मचारियों का भविष्य अधर में लटक सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से भारतीय आईटी कंपनियों की कारोबारी रणनीति पर भी असर पड़ेगा। अमेरिकी बाजार में कुशल कर्मचारियों को लंबे समय तक रोककर रखना अब इन कंपनियों के लिए आसान नहीं होगा। स्थानीय स्तर पर भी इसका विरोध शुरू हो गया है क्योंकि कई कर्मचारी लंबे समय से ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे थे और उनकी फाइलें अब कानूनी पेचीदों में फंस सकती हैं।
कंपनियों और कर्मचारियों के सामने खड़ी नई चुनौतियां
इस ताजा फैसले के बाद प्रभावित कंपनियों के प्रबंधन में हलचल तेज हो गई है। कानूनी सलाहकार और वकीलों की टीमें इस बात की जांच कर रही हैं कि इन पाबंदियों को कैसे हटाया जाए या फिर इसका कोई दूसरा कानूनी विकल्प निकाला जाए। कई कंपनियां अमेरिकी प्रशासन के सामने अपनी बात रखने की तैयारी कर रही हैं ताकि उनके नाम इस सूची से दोबारा जोड़े जा सकें।
दूसरी ओर, अमेरिका में रह रहे आम भारतीय कर्मचारी बेहद डरे हुए और चिंतित हैं। परिवार के साथ अमेरिका में रह रहे कई पेशेवरों का कहना है कि उन्होंने सालों तक वीजा नियमों का पालन किया है लेकिन इस तरह के अचानक फैसलों से उनका पूरा करियर और जीवन प्रभावित हो रहा है। बच्चों की शिक्षा और होम लोन जैसी वित्तीय जिम्मेदारियों के बीच यह अनिश्चितता उनके मानसिक तनाव को और बढ़ा रही है।
भविष्य में आव्रजन नीतियों का रुख
अमेरिका का यह सख्त रवैया साफ इशारा करता है कि आने वाले दिनों में विदेशी नागरिकों के लिए वहां टिकना और आसान नहीं होगा। स्थानीय नौकरियों को प्राथमिकता देने और नियमों को कड़ा करने के नाम पर इस तरह के फैसले लगातार सामने आ रहे हैं। भारतीय तकनीकी क्षेत्र के लिए यह एक बड़ा सबक है कि उन्हें अमेरिकी नीतियों के बदलाव पर पैनी नजर रखनी होगी।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि अमेरिकी श्रम बाजार में विदेशी कामगारों के अधिकारों और कागजी कार्रवाई को लेकर नियमों का दायरा लगातार सिकुड़ रहा है। अगर आने वाले हफ्तों में इन कंपनियों को कोई बड़ी राहत नहीं मिलती है, तो भारतीय आईटी उद्योग को अपने कर्मचारियों के लिए अमेरिका के बाहर दूसरे विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार करना पड़ सकता है।






