रोहतक/नई दिल्ली — हरियाणा के रोहतक जिले के छोटे से गांव रुड़की की बेटी परवीन हुड्डा ने मुश्किल हालातों और अभावों को मात देकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा लहराया है। पिता के असामयिक निधन के बाद मां द्वारा भैंस पालकर और दूध बेचकर जुटाई गई पाई-पाई ने परवीन के सपनों को पंख दिए और उन्होंने एशियन गेम्स में शानदार प्रदर्शन करते हुए देश के लिए पदक जीतकर अपने पिता के सपने को साकार किया।
पिता का साया उठा तो मां बनी संबल, दूध बेचकर उठाई ट्रेनिंग का खर्च
परवीन के पिता कृष्ण हुड्डा का सपना था कि उनकी बेटी खेल जगत में देश का नाम रोशन करे। लेकिन एक गंभीर बीमारी के चलते उनका असामयिक देहांत हो गया। घर की आर्थिक स्थिति बेहद नाजुक हो गई थी। ऐसे संकट के समय में मां माया देवी ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने पशुपालन और दूध बेचकर परवीन की डाइट, बॉक्सिंग किट और ट्रेनिंग का खर्च लगातार जुटाया।
रिंग में परवीन के पंचों का दबदबा: एशियाई खेलों से ओलंपिक तक का सफर
परवीन हुड्डा ने 57 किग्रा और 63 किग्रा भार वर्ग में अपनी चपलता और आक्रामक रणनीति से दुनिया भर की मुक्केबाजों को पछाड़ा। एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण और एशियाई खेलों में पदक जीतकर उन्होंने साबित कर दिया कि हौसले अगर बुलंद हों तो कोई भी मजबूरी रास्ता नहीं रोक सकती।
गांव रुड़की में जश्न: युवाओं के लिए बनीं प्रेरणास्रोत
परवीन की इस ऐतिहासिक सफलता के बाद उनके पैतृक गांव रुड़की और पूरे हरियाणा में खुशी की लहर दौड़ गई। कोच और खेल विशेषज्ञों का कहना है कि परवीन की यह उपलब्धि देश की उन लाखों बेटियों के लिए सबसे बड़ा उदाहरण है जो सीमित संसाधनों के बावजूद आसमान छूने का जज्बा रखती हैं।








