नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — विज्ञान की दुनिया से एक बहुत बड़ी खबर सामने आई है। वैज्ञानिक फ्रांसिस हाल्जेन को भौतिकी का नोबेल पुरस्कार देने का ऐलान किया गया है। उन्हें यह बड़ा सम्मान ब्रह्मांड के सबसे सूक्ष्म और रहस्यमयी कणों यानी न्यूट्रिनो की खोज के लिए मिला है। इस खोज ने अंतरिक्ष विज्ञान और खगोल भौतिकी की दिशा ही बदल दी है। फ्रांसिस हाल्जेन के इस काम से दुनिया भर के वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष के गहरे रहस्यों को समझने में बहुत मदद मिली है।
न्यूट्रिनो कणों को आम बोलचाल की भाषा में घोस्ट पार्टिकल यानी भूतिया कण भी कहा जाता है। ये कण बहुत ही छोटे होते हैं और किसी भी चीज के आर-पार निकल जाते हैं। इन्हें पकड़ना या देखना दुनिया के सबसे कठिन कामों में से एक माना जाता है। फ्रांसिस हाल्जेन ने अपनी पूरी जिंदगी इसी गुत्थी को सुलझाने में लगा दी। उनके इसी कड़े संघर्ष और लगन का नतीजा है कि आज उन्हें विज्ञान के सबसे बड़े पुरस्कार से नवाजा गया है।
आइसक्यूब ऑब्जर्वेटरी का निर्माण और फ्रांसिस हाल्जेन की बड़ी भूमिका
इस पूरी खोज के पीछे फ्रांसिस हाल्जेन का सबसे बड़ा योगदान आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी का निर्माण है। उन्होंने अंटार्कटिका के बर्फीले रेगिस्तान यानी दक्षिण ध्रुव पर इस अनोखी प्रयोगशाला को बनवाया था। बर्फ के नीचे बनाई गई इस विशाल वैधशाला में न्यूट्रिनो कणों को पकड़ने के लिए खास सेंसर लगाए गए हैं। जब अंतरिक्ष से आने वाले ये रहस्यमयी कण बर्फ से टकराते हैं तो हल्की सी नीली चमक पैदा होती है। इसी चमक को मापकर वैज्ञानिक ब्रह्मांड की घटनाओं का पता लगाते हैं।
यह प्रोजेक्ट किसी चमत्कार से कम नहीं था क्योंकि इतनी ठंडी और कठिन जगह पर काम करना बहुत मुश्किल था। फ्रांसिस हाल्जेन ने अपनी टीम के साथ मिलकर साल-दर-साल इस पर मेहनत की। उनके इस साहसी कदम ने साबित कर दिया कि पक्की लगन से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। आज यह वैधशाला दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए ब्रह्मांड की खिड़की बन चुकी है।
घोस्ट पार्टिकल और गॉड पार्टिकल में क्या है बड़ा अंतर?
आम लोगों के मन में अक्सर यह सवाल आता है कि घोस्ट पार्टिकल और गॉड पार्टिकल में क्या फर्क होता है। विज्ञान की भाषा में न्यूट्रिनो को घोस्ट पार्टिकल कहा जाता है क्योंकि यह किसी से क्रिया नहीं करता और चुपचाप निकल जाता है। वहीं दूसरी ओर गॉड पार्टिकल यानी हिग्स बोसॉन कण है जो बाकी सभी कणों को उनका द्रव्यमान या वजन देता है। दोनों ही कण ब्रह्मांड के बनने की कहानी को समझने के लिए बहुत जरूरी हैं लेकिन दोनों के काम करने का तरीका बिल्कुल अलग है।
फ्रांसिस हाल्जेन की इस खोज से हमें यह जानने में आसानी होती है कि तारे कैसे फटते हैं और ब्लैक होल के अंदर क्या होता है। अंतरिक्ष से आने वाली ये अदृश्य किरणें कई ऐसे संदेश लेकर आती हैं जो धरती तक सीधे नहीं पहुंच सकते। न्यूट्रिनो उन संदेशों को हम तक पहुंचाने का काम करते हैं। यही वजह है कि वैज्ञानिक इस खोज को सदी की सबसे बड़ी खोजों में मान रहे हैं।
विज्ञान जगत में खुशी की लहर और भविष्य की नई उम्मीदें
फ्रािसिस हाल्जेन को नोबेल मिलने की खबर से भारत समेत पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों में खुशी की लहर दौड़ गई है। देश-विदेश के विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में इस पर चर्चा हो रही है। युवा वैज्ञानिकों का मानना है कि इस सम्मान से नई पीढ़ी को विज्ञान के क्षेत्र में आगे आने की प्रेरणा मिलेगी। अंतरिक्ष के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए अब और भी बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू हो चुका है।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि आने वाले दिनों में न्यूट्रिनो भौतिकी पर निवेश और शोध बहुत तेजी से बढ़ेंगे। भारत में भी इस दिशा में कई वैज्ञानिक काम कर रहे हैं। फ्रांसिस हाल्जेन की यह सफलता दिखाती है कि अगर इंसान ठान ले तो वह ब्रह्मांड के सबसे बड़े अंधेरे को भी रोशनी में बदल सकता है।






