महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में इस समय कृषि और पशुपालन दोनों ही मोर्चों पर गहरी चिंता के बादल मंडरा रहे हैं। 'द फ्रीलान्स' की ऑन-द-ग्राउंड पड़ताल से यह साफ उभरकर सामने आया है कि राज्य के विभिन्न हिस्सों में पड़े सूखे और अनियमित मानसून ने पोल्ट्री कारोबार की कमर तोड़ दी है। मुर्गी पालन में सबसे बड़ा खर्च उनके दाने (फीड) पर आता है, और इस दाने का मुख्य घटक मक्का है। सूखे के कारण मक्का के उत्पादन में आई भारी गिरावट ने इसकी कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया है, जिससे छोटे और मझोले पोल्ट्री किसान गहरे आर्थिक संकट में फंस गए हैं।
सूखे की दोहरी मार और मक्का संकट
विदर्भ, मराठवाड़ा और उत्तर महाराष्ट्र के कई जिलों में पिछले कुछ महीनों से पानी की भयंकर किल्लत बनी हुई है। कृषि जानकारों और स्थानीय किसानों के मुताबिक, खरीफ सीजन में मक्का की फसल को बारिश न मिलने से भारी नुकसान हुआ। हालात यह हैं कि मंडियों में मक्का की आवक आधे से भी कम रह गई है। नतीजतन, मक्का के दाम पिछले कुछ हफ्तों में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुके हैं। पोल्ट्री फीड बनाने वाली कंपनियों को महंगे दामों पर कच्चा माल खरीदना पड़ रहा है, जिसका सीधा बोझ किसानों पर डाला जा रहा है जो पहले से ही मौसम की मार झेल रहे हैं।
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मुर्गी पालन की लागत में भारी उछाल
पुणे और अहमदनगर के एक स्थानीय पोल्ट्री फार्म के मालिक रमेश पाटिल बताते हैं, "पहले एक चूजे को बड़ा करने और उसे बाजार तक पहुँचाने की जो लागत आती थी, उसमें अब कम से कम 30 से 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो चुकी है। दाने का खर्च ही हमारे कुल बजट का 70 फीसदी हिस्सा होता है। मक्का महंगा होने के कारण अब पोल्ट्री चलाना घाटे का सौदा साबित हो रहा है।" कई छोटे किसानों ने तो लागत न निकल पाने के कारण अपने फार्म अस्थायी रूप से बंद भी कर दिए हैं।
व्यापक परिप्रेक्ष्य: कृषि और सहवर्ती उद्योगों पर असर
महाराष्ट्र के इस संकट के बीच देश के अन्य हिस्सों से कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मिली-जुली तस्वीरें सामने आ रही हैं। उत्तर प्रदेश के अमरोहा में किसान हितैश चौधरी की सफलता की कहानी जहां यह दिखाती है कि कैसे आधुनिक तकनीक और नवाचार से खेती को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाया जा सकता है, वहीं मध्य प्रदेश में सोयाबीन किसानों के लिए शुरू की जा रही 'भावंतर योजना' जैसी पहलें संकट से जूझ रहे अन्नदाताओं को राहत देने का प्रयास कर रही हैं। हालांकि, महाराष्ट्र के पोल्ट्री सेक्टर को ऐसी किसी फौरी और प्रभावी राहत की सख्त दरकार है।
पोल्ट्री कारोबार के भविष्य पर मंडराते सवाल
- मक्का के आयात या सरकारी हस्तक्षेप के बिना कीमतों पर लगाम लगाना मुश्किल नजर आ रहा है।
- छोटे पोल्ट्री किसानों के सामने बैंक ऋण चुकाने और फार्म चलाने का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
- उत्पादन लागत बढ़ने से आने वाले दिनों में आम उपभोक्ताओं की थाली से चिकन और अंडे भी महंगे हो सकते हैं।
- फीड के वैकल्पिक विकल्पों पर तुरंत शोध और सरकारी सहायता की आवश्यकता है।
हमारी पड़ताल का निष्कर्ष यह है कि यदि समय रहते महाराष्ट्र सरकार और केंद्र स्तर पर पोल्ट्री फीड के लिए रियायती दरों पर मक्का उपलब्ध कराने की व्यवस्था नहीं की गई, तो यह संकट राज्य के ग्रामीण आर्थिकी को एक बड़ा झटका दे सकता है। स्वतंत्र पत्रकारिता के नाते 'द फ्रीलान्स' इस स्थिति पर लगातार नजर बनाए रखेगा।








