मुंबई के अंधेरी स्थित स्टूडियो की हलचल से दूर, जब दिग्गज संगीतकार और गायक शंकर महादेवन से 'द फ्रीलांस' की टीम ने मुलाकात की, तो उनके चेहरे पर एक अलग ही ऊर्जा और संगीत को लेकर वही पुरानी चमक थी। मौका था ज़ी टीवी के सबसे प्रतिष्ठित और पुराने सिंगिंग रियलिटी शो 'सा रे गा मा पा' के नए सीजन के आगाज का, जो इस बार 19 सितंबर 2026 से दर्शकों के बीच पहुंच चुका है। शो के जज के रूप में महादेवन ने न सिर्फ इस बार के मेगा स्केल पर खुलकर बात की, बल्कि आज के डिजिटल दौर में संगीत की गिरती साख और एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के बढ़ते दखल पर भी तीखे और सारगर्भित सवाल उठाए।
संगीत की आत्मा और 31 साल का सफर
जब महादेवन से पूछा गया कि इस बार शो में क्या नया है, तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि अब तक के सभी सीजनों के स्तर को दस गुना बढ़ा दीजिए। उन्होंने बताया कि इस बार के सेट पर सिर्फ आवाजें नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता का ऐसा समागम है जो पहले कभी नहीं देखा गया। मंच पर लगभग 100 संगीतकार, 100 कोरस सिंगर्स और देश के सुदूर कोनों से आए लोक कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं।
हालांकि, भव्यता और महंगे सेट के बीच महादेवन ने एक गहरी बात कही। उन्होंने कहा, 'आप किसी इंसान को कितने भी महंगे डिजाइनर कपड़े पहना दें, लेकिन अगर उसके भीतर जीवन और आत्मा नहीं है, तो सब व्यर्थ है। इस शो का जीवन इसका संगीत है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल तकनीकी रूप से परफेक्ट होना या सोशल मीडिया पर रातों-रात वायरल हो जाना किसी कलाकार को बड़ा नहीं बनाता। असली पहचान उस रूहानी एहसास से मिलती है जो सीधे श्रोता के दिल को छू जाए।
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एआई और आधुनिक युग की चुनौतियां
आज के दौर में जब टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस संगीत की दुनिया में तेजी से घुसपैठ कर रहे हैं, महादेवन का मानना है कि कलाकारों को अपनी मौलिकता नहीं खोनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि तकनीक का इस्तेमाल जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए, न कि मानवीय संवेदनाओं को पूरी तरह से रिप्लेस करने के लिए। एक कलाकार का 'ऑरा' उसकी मेहनत, रियाज़ और ईश्वर की उस कृपा से बनता है जो स्टूडियो के कोड से पैदा नहीं की जा सकती। उन्होंने अपने बेटों सिद्धार्थ और शिवम का भी जिक्र किया, जिन्होंने जब इस शो का पहला एपिसोड देखा, तो वे भी इसके भव्य विजुअल और सोनिक एक्सपीरियंस से हैरान रह गए।
प्रमुख बिंदु व पड़ताल
- मेगा स्केल और संस्कृति का संगम: इस सीजन में असम, केरल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों के लोक कलाकारों को मुख्यधारा के मंच पर जगह दी गई है।
- आत्मा ही पहचान है: महादेवन के अनुसार, सिर्फ सुरों का ज्ञान या तकनीकी दक्षता काफी नहीं है; आवाज में वह खास कशिश होनी चाहिए जो श्रोता को मंत्रमुग्ध कर दे।
- सोशल मीडिया बनाम साधना: वायरल लोकप्रियता क्षणिक होती है, जबकि कड़ा रियाज और समर्पण ही किसी कलाकार को लंबे समय तक प्रासंगिक बनाए रखता है।
- एआई का विवेकपूर्ण उपयोग: संगीतकारों को तकनीक का गुलाम बनने के बजाय अपनी मौलिक रचनात्मकता को जिंदा रखना होगा।
'द फ्रीलांस' की इस पड़ताल से यह साफ है कि चमक-धमक और डिजिटल हथकंडों के इस दौर में भी संगीत की असली ताकत उसकी जड़ें और लोक संस्कृति ही हैं। शंकर महादेवन जैसे दिग्गजों का यह नजरिया आने वाली पीढ़ी को शॉर्टकट के जाल से निकालकर सच्ची संगीत साधना की ओर मोड़ने का काम कर रहा है।



