मुंबई की नम हवाओं और भारी मन के बीच प्रभादेवी स्थित पी.एल. देशपांडे महाराष्ट्र कला अकादमी का सभागृह बुधवार को एक अद्वितीय और शोकाकुल माहौल का गवाह बना। अवसर था भारतीय सिनेमा के अप्रतिम अभिनेता और अपने बेबाक अंदाज के लिए पहचाने जाने वाले नाना पाटेकर की आधिकारिक प्रार्थना सभा का। महाराष्ट्र सरकार द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का नाम बेहद भावुक शीर्षक 'आठवणीतले नाना' (यादों के नाना) रखा गया था, जो उनके प्रशंसकों और करीबियों के दिलों में उनकी अमिट छाप को बयां कर रहा था।
गत 8 अक्टूबर को गोवा स्थित उनके आवास पर 75 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से हुए उनके आकस्मिक निधन ने पूरे कला जगत को स्तब्ध कर दिया था। बुधवार को आयोजित इस श्रद्धांजलि सभा में टेलीविजन के लोकप्रिय धारावाहिक 'सीआईडी' के मशहूर अभिनेता शिवाजी साटम, वरिष्ठ अभिनेत्री वर्षा उसगांवकर, अभिनेता अली खान, निर्देशक मेहुल कुमार और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी तुकाराम मुंढे सहित मनोरंजन व प्रशासन जगत की कई जानी-मानी हस्तियां पहुंचीं। सभी ने उनकी तस्वीर पर पुष्प अर्पित कर अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि दी। प्रार्थना सभा के पश्चात उनके प्रशंसकों और करीबियों के लिए उनकी चुनिंदा फिल्मों की एक विशेष स्क्रीनिंग का भी आयोजन किया गया, जिसने पुरानी यादों को ताजा कर दिया।
'आठवणीतले नाना': स्मृतियों का गलियारा और सिनेमाई योगदान
- प्रशासनिक और कला जगत की उपस्थिति: प्रभादेवी के कला अकादमी सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में शिवाजी साटम और तुकाराम मुंढे जैसी शख्सियतों का पहुंचना इस बात का प्रमाण था कि नाना पाटेकर का प्रभाव केवल सिनेमा तक सीमित नहीं था, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गाें पर था।
- आकस्मिक निधन और चिकित्सा पड़ताल: गत 8 अक्टूबर की सुबह गोवा में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हुआ था। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ था कि एथेरोस्क्लेरोटिक कोरोनरी आर्टरी डिजीज के चलते दिल की मुख्य नस (लेफ्ट मेन कोरोनरी आर्टरी) में खून का थक्का जमने से उनकी मृत्यु प्राकृतिक कारणों से हुई थी।
- अंतिम विदाई और राजकीय सम्मान: गोवा से पार्थिव शरीर को उनके पुणे स्थित फार्महाउस लाया गया था, जहां मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे सहित तमाम दिग्गजों की मौजूदगी में राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ था।
नाना पाटेकर का पांच दशकों का करियर महज अभिनय की यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है। 'परिंदा' से लेकर 'तिरंगा', 'क्रांतिवीर' और 'वेलकम' तक, उन्होंने हर विधा में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया। उनका गुस्सैल और बेबाक अंदाज, पर्दे पर उनकी दहाड़ती हुई संवाद शैली और असल जिंदगी में उनकी संवेदनशीलता हमेशा दर्शकों के दिलों में जिंदा रहेगी। 'द फ्रीलांस' की इस विशेष ग्राउंड रिपोर्ट के जरिए हम उस शख्सियत को याद कर रहे हैं, जिन्होंने रूपहले पर्दे पर न्याय और असंतोष की परिभाषा ही बदल दी थी।






