प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट और अमेरिकी समाज की बदलती मानसिकता
वैश्विक मामलों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर नजर रखने वाले प्रतिष्ठित संस्थान प्यू रिसर्च सेंटर (Pew Research Center) ने हाल ही में एक नया सर्वे जारी किया है। इस सर्वे में यह समझने की कोशिश की गई है कि अमेरिकी नागरिक दुनिया के बाकी देशों और वहां की राजनीति को किस नजरिए से देखते हैं। रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय संबंधों, आर्थिक प्राथमिकताओं और भू-राजनीतिक खतरों को लेकर अमेरिकी जनता के रुख को बहुत करीब से टटोला गया है। सर्वे के नतीजे बताते हैं कि दुनिया के विभिन्न देशों के प्रति अमेरिकी नागरिकों का नजरिया लगातार बदल रहा है, जिसका सीधा असर कूटनीतिक वार्ताओं पर भी पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के सर्वे केवल आंकड़ों का खेल नहीं हैं, बल्कि यह यह भी दर्शाते हैं कि आम अमेरिकी नागरिक वैश्विक पटल पर हो रहे बदलावों को किस रूप में ग्रहण कर रहे हैं। हालांकि रिपोर्ट के कुछ अंशों को लेकर कूटनीतिक गलियारों में नई बहस छिड़ गई है, लेकिन यह स्पष्ट हो चुका है कि अमेरिका की घरेलू राजनीति अब विदेश नीति से सीधे तौर पर प्रभावित हो रही है। भारतीय संदर्भ में देखें तो अमेरिका के भीतर प्रवासी समुदायों की सुरक्षा और वहां की सामाजिक तासीर पर इसका गहरा असर देखने को मिल रहा है।
इलिनॉय के हिंदू मंदिर पर हमले की साजिश और सांसद राजा कृष्णमूर्ति का दर्द
एक तरफ जहां वैश्विक सर्वे अमेरिका के बदलते रुख को सामने ला रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी धरती पर धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर भारतीय प्रवासियों के खिलाफ बढ़ रही नफरत ने गंभीर चिंता पैदा कर दी है। अमेरिकी सांसद राजा कृष्णमूर्ति ने हाल ही में एक ऐसा ही कड़वा अनुभव साझा किया, जिसने सभी को झकझोर कर रख दिया। इलिनॉय के औरोरा स्थित प्रतिष्ठित हिंदू मंदिर को निशाना बनाकर रची गई सामूहिक गोलीबारी की साजिश को याद करते हुए सांसद कृष्णमूर्ति बुरी तरह भावुक हो गए।
घटना के वक्त उनका परिवार भी उसी मंदिर परिसर में मौजूद था। सांसद ने बताया कि किस तरह मौत उनके बेहद करीब से गुजर गई थी। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें आज तक यह समझ नहीं आया कि हमलावर की बंदूक अचानक बीच में ही क्यों और कैसे जाम हो गई, जिससे एक बड़ा नरसंहार टल गया। इस भयावह अनुभव ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी है और अब वे अमेरिका में नस्लीय व धार्मिक नफरत के खिलाफ खुलकर आवाज उठा रहे हैं।
आतंकी साजिश का भंडाफोड़ और 19 वर्षीय आरोपी की गिरफ्तारी
कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने तत्परता दिखाते हुए इस खतरनाक साजिश को नाकाम कर दिया और आरोपी को धर दबोचा। जांच में सामने आया कि शिकागो के नजदीक स्थित श्री वेंकटेश्वर स्वामी (बालाजी) मंदिर को विशेष रूप से निशाना बनाया गया था। इस मंदिर में हर हफ्ते सैकड़ों की संख्या में भारतीय मूल के लोग और अमेरिकी हिंदू परिवार पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। हमलावर की मंशा इस पावन स्थल पर भारी खून-खराबा करने की थी, लेकिन तकनीकी कारणों या हथियारों में आई तकनीकी खराबी के चलते वह अपने नापाक मंसूबों में कामयाब नहीं हो सका।
पुलिस ने इस मामले में 19 वर्षीय अलेक्जेंड्रोस पापोराकिस को गिरफ्तार किया है। उस पर आतंकवादी धमकी देने, हिंसा भड़काने और अवैध रूप से घातक हथियार रखने के गंभीर आरोप तय किए गए हैं। स्थानीय प्रशासन और फेडरल एजेंसियां इस बात की गहराई से जांच कर रही हैं कि क्या इस युवक के पीछे किसी बड़े हेट ग्रुप या कट्टरपंथी संगठन का हाथ था। इस गिरफ्तारी के बाद से स्थानीय भारतीय समुदाय में सुरक्षा को लेकर चिंताएं और अधिक बढ़ गई हैं, जिसके बाद मंदिरों के आसपास पुलिस गश्त बढ़ा दी गई है।
नफरत के खिलाफ खड़े होने का संकल्प और अमेरिकी राजनीति में उठापटक
इस पूरी घटना और प्यू रिसर्च के आंकड़ों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वैचारिक असहिष्णुता और नस्लीय नफरत पश्चिमी देशों में भी कितनी गहरी जड़ें जमा चुकी है। सांसद राजा कृष्णमूर्ति ने साफ शब्दों में कहा है कि इस तरह की घटनाएं उन्हें और अधिक मजबूत बनाती हैं ताकि वे अमेरिका में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए संसद से लेकर सड़क तक लड़ाई लड़ सकें। उन्होंने इस संकट से उबरने के लिए समाज के सभी वर्गों से आगे आने की अपील की है।
"मुझे नहीं पता कि हमलावर की बंदूक कैसे जाम हो गई। मुझे नहीं पता कि मेरा परिवार और दूसरे लोग कैसे बच निकले। लेकिन मेरा मानना है कि इसके पीछे एक उद्देश्य था, ताकि मैं यहां आकर नफरत के खिलाफ बोल सकूं। अब यह मेरे जीवन के प्रमुख उद्देश्यों में से एक बन गया है।" — राजा कृष्णमूर्ति, अमेरिकी सांसद
आने वाले दिनों में इस तरह के मामलों पर अमेरिकी प्रशासन और न्यायपालिका का रुख क्या रहता है, इस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं। भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और धार्मिक स्थलों पर हो रहे हमलों को रोकना अमेरिकी सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती बन गया है। विश्लेषकों का मानना है कि जब तक राजनीतिक दल नफरत फैलाने वाली ताकतों के खिलाफ कड़े कदम नहीं उठाएंगे, तब तक इस तरह की वारदातों पर पूरी तरह लगाम लगाना बेहद मुश्किल होगा।












