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इजराइल में 20 दिन बाद होने वाले चुनाव, नेतन्याहू की कुर्सी पर मंडराया बड़ा खतरा

इजराइल में आगामी 20 दिनों के भीतर आम चुनाव होने जा रहे हैं। हमास के साथ हुए भीषण युद्ध और सुरक्षा चूकों के बाद देश की पूरी राजनीतिक तस्वीर बदल चुकी है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की सबसे बड़ी चुनौती है। वामपंथी दल कमजोर पड़े हैं और अरब पार्टियों की भूमिका भी इस चुनाव में अहम हो गई है।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•7 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•46
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इजराइल में 20 दिन बाद होने वाले चुनाव, नेतन्याहू की कुर्सी पर मंडराया बड़ा खतरा
📷 इजराइल में 20 दिन बाद होने वाले चुनाव, नेतन्याहू की कुर्सी पर मंडराया बड़ा खतरा — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • इजराइल में आगामी 20 दिनों के भीतर आम चुनाव होने जा रहे हैं। हमास के साथ हुए भीषण युद्ध और सुरक्षा चूकों के बाद देश की पूरी राजनीतिक तस्वीर बदल चुकी है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की सबसे बड़ी चुनौती है। वामपंथी दल कमजोर पड़े हैं और अरब पार्टियों की भूमिका भी इस चुनाव में अहम हो गई है।
  • इस खबर से जुड़े सभी पहलुओं की जांच और निगरानी संबंधित विभागों द्वारा की जा रही है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार इस घटनाक्रम का आम जनता पर सीधा असर पड़ सकता है।

इजराइल की राजनीति इस वक्त एक बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ी है। देश में ठीक 20 दिन बाद आम चुनाव होने वाले हैं। हमास के साथ हुए खूनी संघर्ष के बाद इजराइल की जनता का मूड पूरी तरह बदल चुका है। युद्ध के दौरान सरकार की रणनीतियों और खुफिया तंत्र की नाकामियों पर बड़े सवाल उठे थे। इन सवालों के घेरे में सीधे तौर पर देश के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू खड़े नजर आ रहे हैं।

बीते कुछ महीनों में देश की आंतरिक सुरक्षा और बाहरी खतरों से निपटने के तरीके ने राजनीतिक समीकरणों को उलट-पुलट दिया है। कभी देश के सबसे ताकतवर नेता माने जाने वाले नेतन्याहू इस बार भारी सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रहे हैं। आम जनता में यह गुस्सा साफ दिखाई दे रहा है कि युद्ध को रोकने या पहले ही इसे भांपने में सरकार से भारी चूक हुई थी। विपक्षी दल इसी मुद्दे को लेकर लगातार आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं।

नेतन्याहू की लकीर कमजोर, वामपंथी दलों की स्थिति पर बड़ा असर

युद्ध के इस माहौल ने इजराइल के पारंपरिक राजनीतिक खेमों को गहरा झटका दिया है। देश का वामपंथ इस संकट के दौर में और ज्यादा कमजोर हो गया है। शांति वार्ता और कूटनीति की बात करने वाले वामपंथी दल इस समय मतदाताओं के बीच अपनी कोई खास जगह नहीं बना पा रहे हैं। युद्ध की विभीषिका ने सुरक्षा और सैन्य ताकत को आम नागरिकों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा बना दिया है। ऐसे में वामपंथी विचारधारा के नेताओं के लिए जनता का समर्थन जुटाना बेहद मुश्किल हो गया है।

दूसरी ओर, दक्षिणपंथी और कट्टर राष्ट्रवादी ताकतों का पलड़ा भी इस बार पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। नेतन्याहू के लंबे कार्यकाल से ऊब चुके मतदाता अब बदलाव की तलाश में हैं। चुनाव प्रचार के दौरान यह साफ दिख रहा है कि लोग केवल सुरक्षा के नाम पर आंख मूंदकर समर्थन देने को तैयार नहीं हैं। भ्रष्टाचार के पुराने मामलों और हालिया युद्ध प्रबंधन ने नेतन्याहू की छवि को तगड़ा नुकसान पहुंचाया है।

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अरब पार्टियों की भूमिका और बदलता चुनावी गणित

इस चुनाव में एक और दिलचस्प बात यह देखने को मिल रही है कि अरब पार्टियों की राजनीतिक जमीन भी खिसक रही है या फिर वे नए समीकरण तलाश रही हैं। युद्ध के बाद इजराइल के भीतर यहूदी और अरब नागरिकों के बीच की खाई थोड़ी और चौड़ी हुई है। इसके बावजूद, चुनाव के अंतिम नतीजों में किसी भी गठबंधन को बहुमत तक पहुंचाने में छोटी पार्टियों की भूमिका अहम हो सकती है। कोई भी अकेला दल आसानी से सरकार बनाने की स्थिति में नहीं दिख रहा है।

जमीनी हकीकत यह है कि इजराइल की जनता युद्ध की थकान और भविष्य के अनिश्चित साए के बीच मतदान करने जा रही है। नेतन्याहू अपने राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी जंग लड़ रहे हैं। अगर चुनाव नतीजे उनके खिलाफ आते हैं, तो दशकों से इजराइल की राजनीति पर काबिज एक बड़े चेहरे का युग हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा। आने वाले 20 दिन तय करेंगे कि तेल अवीव की सत्ता पर अगला ताज किसके सिर सजेगा।

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