नई दिल्ली के एक व्यस्त अस्पताल के गैस्ट्रोएंटरोलिजी वार्ड के बाहर मरीजों की लंबी कतारें सिर्फ इस बात का गवाह नहीं हैं कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है, बल्कि यह एक साइलेंट एपिडेमिक की ओर इशारा करती हैं। 'द फ्रीलान्स' की टीम ने जब जमीनी स्तर पर पड़ताल की, तो आंकड़े चौंकाने वाले मिले। तीस से पैंतीस साल की उम्र के युवा, जो खुद को फिट और ऊर्जावान मानते थे, आज क्रोनिक लिवर डिजीज यानी गंभीर यकृत रोग की चपेट में आ चुके हैं।
बदली जीवनशैली और खानपान: युवाओं के लिए बन रहा नासूर
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जंक फूड, अत्यधिक कैलोरी युक्त डाइट और शारीरिक गतिविधियों की कमी ने युवाओं की मेटाबोलिक हेल्थ को बुरी तरह प्रभावित किया है। नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) अब केवल अधिक उम्र के लोगों की बीमारी नहीं रही। ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान डॉक्टरों ने बताया कि उनके पास आने वाले हर दस में से चार मरीज युवा हैं, जिन्हें शुरुआती स्तर पर फैटी लिवर की समस्या थी, लेकिन उन्होंने इसे महज 'गैस' या 'सामान्य कमजोरी' समझकर नजरअंदाज कर दिया।
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जब फैटी लिवर बदल जाता है सिरोसिस में
विशेषज्ञों के अनुसार, जब लिवर की कोशिकाओं में अत्यधिक चर्बी जमा होने लगती है, तो वहां सूजन (Steatohepatitis) शुरू हो जाती है। समय रहते अगर इस पर लगाम न लगाई जाए, तो यह फाइब्रोसिस में और अंततः सिरोसिस में बदल जाती है। सिरोसिस एक ऐसी स्थिति है जहां लिवर के टिशू स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त और जख्मी (Scarred) हो जाते हैं। एक सीनियर हेपैटोलॉजिस्ट ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, 'युवाओं में यह प्रक्रिया बेहद तेजी से हो रही है क्योंकि उनका लिवर पहले से ही प्रोसेस्ड फूड और स्ट्रेस के दोहरे दबाव में होता है।'
एक्सपर्ट्स की कड़ी चेतावनी: समय रहते दें ध्यान
मेडिकल प्रोफेशनल्स का साफ कहना है कि फैटी लिवर को रिवर्स किया जा सकता है, बशर्ते इसे शुरुआती दौर में ही पकड़ लिया जाए। लेकिन समस्या यह है कि इसके शुरुआती लक्षण आसानी से समझ नहीं आते। थकान, पेट के दाहिने हिस्से में हल्का भारीपन और सुस्ती को लोग काम का तनाव मान लेते हैं। एम्स और अन्य प्रमुख चिकित्सा संस्थानों के वरिष्ठ डॉक्टरों ने सलाह दी है कि नियमित हेल्थ चेकअप, खासकर लिवर फंक्शन टेस्ट (LFT) और अल्ट्रासाउंड को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।
भविष्य का संकट और हमारी तैयारी
अगर समय रहते युवाओं में इस जानलेवा बीमारी के प्रति जागरूकता नहीं फैलाई गई, तो आने वाले दशक में देश में लिवर फेलियर और ट्रांसप्लांट के मामलों में भारी उछाल देखने को मिलेगा। 'द फ्रीलान्स' की यह पड़ताल केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक गंभीर आत्ममंथन का बुलावा है। वक्त आ गया है कि हम अपनी थाली और अपनी जीवनशैली दोनों को सुधारें, वरना यह खामोश قاتل हमारी युवा पीढ़ी की रीढ़ की हड्डी तोड़ देगा।








