जब गंभीर बीमारियों के इलाज की बात आती है, तो परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती वित्तीय बोझ की होती है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की एक सख्त टिप्पणी ने देश भर में अस्पतालों और फार्मेसी के जरिए बेची जाने वाली दवाओं पर मिलने वाले भारी मुनाफे के खेल को उजागर कर दिया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि मरीजों की मजबूरी का फायदा उठाकर दवाओं पर दस गुना तक मुनाफा कमाना बेहद चिंताजनक है।
कैंसर की दवाओं और भारी मार्जिन पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती
सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने अस्पतालों द्वारा कैंसर की दवाओं पर दस गुना तक कीमत बढ़ाने पर तीखा सवाल उठाया। अदालत ने इसे ‘कत्लेआम’ जैसी गंभीर संज्ञा दी। एक उदाहरण के जरिए यह सामने आया कि जो दवा खुदरा विक्रेताओं को करीब 2,700 रुपए में दी जाती है, वही अस्पताल मरीजों को 27,000 रुपए तक में बेच रहे हैं।
अदालत ने इस बात पर भी गंभीर आपत्ति जताई कि कई अस्पतालों में यह नियम होता है कि भर्ती मरीजों को केवल अस्पताल के भीतर की ही फार्मेसी से दवाएं और मेडिकल उपकरण खरीदने होंगे। इस तरह की बाध्यता के कारण मरीजों के पास बाहर जाकर बेहतर या सस्ती दरों पर दवाएं तलाशने का कोई विकल्प नहीं बचता।
अस्पतालों में दवाओं की भारी कीमतें और मरीजों की मजबूरी पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी। #SupremeCourt #Healthcare
— The Freelance (@TheFreelanceIn) September 26, 2023
संबंधित खबरें
दवाओं की मूल्य व्यवस्था और नियामकीय चुनौतियां
भारत में दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। राष्ट्रीय आवश्यक दवा सूची में शामिल दवाओं की अधिकतम कीमत राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) तय करता है। हालांकि, कई नॉन-शेड्यूल दवाओं के मामले में कंपनियों और वेंडर्स को शुरुआती एमआरपी तय करने में काफी छूट मिलती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आईसीयू में भर्ती या कीमोथेरेपी करा रहा मरीज ऐसी स्थिति में नहीं होता कि वह विभिन्न दुकानों पर जाकर कीमतों की तुलना कर सके। ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क (AIDAN) जैसे संगठनों का मानना है कि केवल व्यापारिक मार्जिन पर सीमा लगाने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि जीवनरक्षक और जरूरी दवाओं की मूल कीमतों को सख्ती से नियंत्रित करने की आवश्यकता है। दूसरी ओर, अस्पतालों का तर्क है कि कोल्ड चेन, भंडारण, और कर्मचारियों के वेतन जैसी लागतें भी इसमें शामिल होती हैं, लेकिन मुनाफे की यह सीमा कहां तय हो, यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल इस वीडियो के दावों की सत्यता की 'The Freelance' स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है। यह वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा का विषय बना हुआ है। वीडियो साभार: संबंधित सोशल मीडिया हैंडल / क्रिएटर।







